चारधाम यात्रा पर ‘संकट’ का पहरा: गैस की कमी हुई तो चूल्हों पर बनेगा खाना, सरकार का ‘प्लान-बी’ तैयार

देहरादून। वैश्विक तनाव और संभावित गैस आपूर्ति संकट के बीच उत्तराखंड सरकार ने आगामी चारधाम यात्रा को निर्बाध रखने के लिए एक ठोस ‘प्लान-बी’ तैयार किया है। 19 अप्रैल से शुरू हो रही इस पावन यात्रा में इस बार सरकार केवल एलपीजी गैस पर निर्भर नहीं रहेगी। यात्रियों और स्थानीय व्यापारियों को ईंधन की किल्लत न हो, इसके लिए चारधाम मार्गों पर जलौनी लकड़ी के अस्थायी डिपो स्थापित किए जा रहे हैं। वन विभाग और वन विकास निगम के समन्वय से तैयार इस योजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय कारणों से गैस आपूर्ति प्रभावित होती है, तो भी श्रद्धालुओं के भोजन और रुकने की व्यवस्था में कोई बाधा न आए। सरकार के इस प्लान-बी के तहत चारधाम यात्रा मार्गों पर प्रमुख पड़ावों और संवेदनशील क्षेत्रों में अस्थायी लकड़ी डिपो स्थापित किए जाएंगे। इन डिपो के माध्यम से होटल, ढाबा संचालकों और स्थानीय लोगों को जरूरत के अनुसार जलौनी लकड़ी उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे गैस की कमी होने पर भी चूल्हों पर भोजन तैयार किया जा सके।
दरअसल, 19 अप्रैल से गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ ही यात्रा का आगाज होने जा रहा है। हर साल लाखों श्रद्धालु उत्तराखण्ड पहुंचते हैं, जिससे ईंधन की मांग अचानक कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में यदि वैश्विक हालात के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर यात्रा व्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए सरकार ने समय रहते वैकल्पिक इंतजाम शुरू कर दिए हैं। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने स्पष्ट किया है कि सरकार की प्राथमिकता चारधाम यात्रा को सुरक्षित और सुचारु बनाना है। उन्होंने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो जलौनी लकड़ी को वैकल्पिक ईंधन के रूप में बड़े स्तर पर उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि श्रद्धालुओं और स्थानीय व्यापारियों को किसी प्रकार की दिक्कत न हो।
इस बीच राज्य सरकार केंद्र और संबंधित एजेंसियों के साथ गैस आपूर्ति को लेकर लगातार संपर्क में है। हालांकि, यदि अंतरराष्ट्रीय संकट लंबा खिंचता है, तो वैकल्पिक व्यवस्थाएं ही राहत का प्रमुख माध्यम बनेंगी। ऐसे में लकड़ी आधारित ईंधन की यह व्यवस्था यात्रा के दौरान अहम भूमिका निभा सकती है। सरकार केवल लकड़ी डिपो तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की जरूरतों को देखते हुए अन्य स्रोतों पर भी विचार किया जा रहा है। होप्लो कीट से प्रभावित और सूख रहे पेड़ों को जलौनी लकड़ी के रूप में उपयोग में लाने की योजना बनाई गई है। इसके अलावा वन क्षेत्रों में फायर लाइन बनाने के दौरान हटाए गए पेड़ों को भी इस काम में इस्तेमाल किया जाएगा। अब तक इस तरह की 45 लॉट वन विकास निगम को सौंपी जा चुकी हैं।
प्रमुख मुख्य वन संरक्षक आरके मिश्र के अनुसार, वन विभाग और वन विकास निगम मिलकर इस योजना को अमल में ला रहे हैं। यात्रा मार्गों पर ऐसे स्थान चिन्हित किए जा रहे हैं, जहां अस्थायी डिपो स्थापित किए जा सकें। उन्होंने यह भी बताया कि निगम के पास पहले से पर्याप्त मात्रा में जलौनी लकड़ी उपलब्ध है और प्राथमिकता पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी आपूर्ति सुनिश्चित करने की है।



