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धान की खेती से घटेगा प्रदूषण: मीथेन उत्सर्जन पर वैज्ञानिकों का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

 

देहरादून। वैश्विक स्तर पर गहराते जलवायु परिवर्तन के संकट के बीच कृषि वैज्ञानिकों ने एक बड़ी राहत भरी खबर दी है। पर्यावरण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड से भी कहीं अधिक घातक मानी जाने वाली मीथेन गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिए कटक स्थित ‘राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान’ (CRRI) ने एक क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है। वैज्ञानिकों के पिछले 15 वर्षों के कड़े शोध से यह सिद्ध हुआ है कि यदि किसान धान की खेती के पारंपरिक तरीकों को छोड़कर आधुनिक वैज्ञानिक विधियों को अपनाएं, तो मीथेन गैस के खतरनाक उत्सर्जन को 35 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

पीआईबी (PIB) देहरादून के सौजन्य से ओडिशा के अध्ययन प्रवास पर गए मीडिया दल ने पाया कि यह तकनीक विशेष रूप से उत्तराखंड के सीढ़ीदार खेतों और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। ‘वैकल्पिक गीला और सूखा’ (AWD) प्रबंधन और ‘सीधी बुआई’ (DSR) जैसी पद्धतियों के जरिए न केवल जहरीली गैसों के प्रभाव को कम किया जा सकता है, बल्कि पानी की भारी बचत के साथ पैदावार में भी सुधार संभव है। यह शोध न केवल पर्यावरण के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि भविष्य की सुरक्षित और सतत खेती (Sustainable Farming) की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होने वाला है। सीआरआरआई कटक धान की 194 से ज्यादा प्रजातियों पर काम कर चुका। इसके अलावा ऐसी नई प्रजातियां पर भी शोध कर रहा है जो कम पानी और कम समय के भीतर ज्यादा से ज्यादा पैदावार दे सके। संस्थान के निदेशक प्रताप भट्टाचार्य ने प्रतिनिधिमंडल को बताया कि 1960 के दशक में जब पश्चिमी बंगाल समेत देश के कई हिस्सों में भुखमरी फैली थी तो इस संस्थान ने कुपोषण से निपटने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि चावल की खेती से मीथेन गैस को कैसे कम किया जा सकता है, इस पर पिछले 15 सालों से शोध चल रहे हैं, जिसमें संस्थान को बड़ी सफलता हासिल हुई है। काश्तकारों को धान की खेती परंपरागत तरीके के बजाय नए विधि अपनाने पर जोर दिया गया, जिसके बेहतर परिणाम अब सामने आने लगे हैं।

  • धान की खेती से मीथेन कम करने तरीके: वैकल्पिक गीला और सूखा करना (अल्टरनेट वैटिंग एंड ड्राइंग ) यह विधि मीथेन गैस को कम करने का सबसे बेहतर तरीका है। इसमें खेत में हमेशा पानी भरकर नहीं रखा जाता। जब पानी सूख जाता है, तब कुछ दिनों बाद दोबारा सिंचाई की जाती है। इससे मिट्टी में ऑक्सीजन पहुंचती है और मीथेन बनाने वाले बैक्टीरिया मर जाते हैं। इस विधि से मीथेन गैस को 25 फीसदी तक कम किया जा सकता है।
  • सीधी बुआई : पारंपरिक तरीके में पहले नर्सरी में पौधे तैयार कर उन्हें पानी भरे खेत में रोपा जाता है। इसके उलट डीएसआर विधि में बीजों की सीधी बुआई सूखी या कम नमी वाली मिट्टी में की जाती है। इससे शुरुआती हफ्तों में पानी भरने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे मीथेन उत्सर्जन बहुत कम हो जाता है। उत्तराखंड के सीढ़ीदार खेतों के लिए यह तरीका सबसे कारगर तरीका साबित हो सकता है। इस विधि से मीथेन को 30 से 35 फीसदी तक कम किया जा सकता है।

राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने हाल ही में एमटी-22 नाम के बैक्टीरिया का फॉर्मूलेशन तैयार किया है। ये ऐसे बैक्टीरिया हैं जो मीथेन को ‘खाकर’ उसे कार्बन डाइऑक्साइड में बदल देते हैं, जो कि मीथेन के मुकाबले कम नुकसानदेह है। इसे मिट्टी में डालने से भी उत्सर्जन कम किया जा सकता है।

डा.प्रताप भट्टाचार्य
निदेशक
राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक

संस्थान के वैज्ञानिकों ने धान की ऐसी कई किस्में विकसित की हैं जो कम पानी में तेजी से बढ़ती हैं। कम अवधि वाली फसलें कम समय तक खेत में रहती हैं, जिससे उत्सर्जन का समय कम हो जाता है। ऐसी किस्मों का चयन करना जिनमें जड़ों के माध्यम से गैस का रिसाव कम होता हो।
डा. अंजनी कुमार
वैज्ञानिक
राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक

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