उत्तराखंड

उत्तराखंड में खेती की ओर लौटने लगे किसान, 2 साल में घट गई 7,897 हेक्टेयर परती भूमि

Dehradun, 23 August, 2026। उत्तराखंड में लंबे समय से खाली पड़ी कृषि भूमि को लेकर एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार के कृषि आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022-23 से 2024-25 के बीच प्रदेश की कुल परती भूमि में 7,897 हेक्टेयर की उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। पौड़ी, हरिद्वार और टिहरी समेत 7 पहाड़ी व मैदानी जिलों में किसानों का रुझान दोबारा खेती, मिलेट (मोटे अनाज), औद्यानिकी और चाय बागान की ओर बढ़ा है, जिससे कृषि के विस्तार को नई उम्मीद मिली है। परती भूमि में सबसे बड़ी कमी पौड़ी जिले में दर्ज हुई है।

यहां वर्ष 2022-23 में 61,122 हेक्टेयर भूमि परती थी, जो 2024-25 में घटकर 55,320 हेक्टेयर रह गई। यानी 5,802 हेक्टेयर जमीन दोबारा कृषि उपयोग में आई। हरिद्वार में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यहां परती भूमि 12,624 हेक्टेयर से घटकर 9,672 हेक्टेयर रह गई, यानी 2,952 हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। इसी तरह टिहरी में परती भूमि 25,183 से घटकर 22,701 हेक्टेयर, चंपावत में 16,965 से घटकर 14,869 हेक्टेयर और देहरादून में 23,947 से घटकर 22,884 हेक्टेयर रह गई। पिथौरागढ़ में यह रकबा 15,187 से घटकर 14,703 हेक्टेयर और अल्मोड़ा में 26,854 से घटकर 26,447 हेक्टेयर रह गया। आंकड़े बताते हैं कि इन सात जिलों में कुल मिलाकर खेती से बाहर पड़ी जमीन में कमी आई है। उत्तराखंड में खेती को दोबारा विस्तार देने के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन, सिंचाई की कमी, खेती की लागत और जंगली जानवरों से फसल नुकसान के कारण लंबे समय से कृषि भूमि परती छोड़ने की समस्या रही है। ऐसे में सात जिलों में परती भूमि का घटना उम्मीद जगाता है। अब चुनौती इस जमीन को लगातार कृषि उपयोग में बनाए रखने की है। इसके लिए सिंचाई, बेहतर बाजार, फसल सुरक्षा और लाभकारी कृषि व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होग। हालांकि राज्य के सभी जिलों में यह रुझान एक जैसा नहीं है। छह जिलों में परती भूमि बढ़ी है। ऊधम सिंह नगर में यह रकबा 9,487 से बढ़कर 13,231 हेक्टेयर हो गया, जो 3,744 हेक्टेयर की वृद्धि है।

चमोली में परती भूमि 3,880 से बढ़कर 5,376 हेक्टेयर और रुद्रप्रयाग में 1,806 से बढ़कर 2,558 हेक्टेयर हो गई। बागेश्वर में भी यह 4,402 से बढ़कर 5,024 हेक्टेयर और नैनीताल में 10,175 से बढ़कर 10,700 हेक्टेयर हो गई। उत्तरकाशी में परती भूमि 4,350 से बढ़कर 4,600 हेक्टेयर दर्ज हुई। कृषि निदेशक दिनेश कुमार के अनुसार, मिलेट नीति के तहत मंडुवा समेत अन्य मोटे अनाजों का क्षेत्रफल बढ़ाया गया है। साथ ही सब्जी, चाय और औद्यानिकी के लिए भी परती भूमि का उपयोग किया जा रहा है। उनका कहना है कि परती भूमि में कमी इस बात का संकेत है कि किसान दोबारा खेती की ओर लौट रहे हैं और आने वाले वर्षों में यह रुझान और मजबूत हो सकता है।

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