उत्तराखंड

सिलेंडर की किल्लत: होटल-ढाबों को याद आए ‘मिट्टी के तंदूर’

देहरादून। रसोई गैस की भारी किल्लत ने जहाँ आम जनता और होटल कारोबारियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं, वहीं ज्वालापुर के कुम्हारों के लिए यह संकट खुशहाली की नई किरण लेकर आया है। सिलेंडरों की कमी के कारण होटलों और ढाबों में एक बार फिर पारंपरिक चूल्हों, अंगीठियों और मिट्टी के तंदूरों की मांग कई गुना बढ़ गई है। आधुनिकता की दौड़ में हाशिए पर जा चुके इस पारंपरिक व्यवसाय में अब इतनी तेजी आई है कि कुम्हारों की आमदनी पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ रही है।

लम्बे समय से मंदी का सामना कर रहे कुम्हारों के लिए यह दौर किसी नए अवसर से कम नहीं है। बढ़ती मांग को देखते हुए कुम्हार दिन-रात मेहनत कर अलग-अलग आकार के चूल्हे और तंदूर तैयार कर रहे हैं। उनका कहना है कि जो काम पहले ठप पड़ चुका था, वही अब तेजी से चल निकला है। बीते कुछ दिनों में बिक्री इतनी बढ़ी है कि उसने पिछले कई महीनों के आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया है।

इस बदलाव का असर कोयला कारोबार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। ढाबों और होटलों में अंगीठियों और तंदूरों के इस्तेमाल बढ़ने से कोयले की मांग में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। स्थानीय कारोबारी बताते हैं कि अब उन्हें पहले से कहीं ज्यादा ऑर्डर मिल रहे हैं और वे लगातार सप्लाई बनाए रखने में जुटे हैं।

स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि आधुनिक रसोई उपकरणों के दौर में पारंपरिक साधन लगभग भुला दिए गए थे, लेकिन गैस संकट ने एक बार फिर इन्हें प्रासंगिक बना दिया है। ज्वालापुर के कुम्हार अब ग्राहकों की जरूरत के अनुसार खास डिजाइन के तंदूर भी तैयार कर रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी में इजाफा हुआ है।

होटल संचालकों का कहना है कि गैस की कमी से जहां काम प्रभावित हो रहा था, वहीं अब मिट्टी के चूल्हों और तंदूर के उपयोग से लागत में कमी आई है। साथ ही, कोयले की आंच पर बने खाने का स्वाद भी ग्राहकों को खासा पसंद आ रहा है।

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