उत्तराखंड

खेत से सीधे जुड़ेंगे भावी कृषि वैज्ञानिक, पंतनगर विश्वविद्यालय की अनूठी पहल

पंतनगर। कृषि वैज्ञानिक बनने का सपना अब केवल किताबों और प्रयोगशालाओं के बंद कमरों तक सीमित नहीं रहेगा। गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत छात्रों को सीधे खेत की व्यावहारिक चुनौतियों से जोड़ने की एक अनूठी पहल शुरू की है। विश्वविद्यालय ने इसके लिए 10 हेक्टेयर कृषि भूमि को समर्पित किया है, जहां लगभग 160 छात्र ‘प्रैक्टिकल क्रॉप प्रोडक्शन स्किलिंग’ योजना के तहत खुद बीज बोने से लेकर फसल बेचने तक की पूरी प्रक्रिया का प्रबंधन संभाल रहे हैं।
विश्वविद्यालय की ‘प्रैक्टिकल क्रॉप प्रोडक्शन स्किलिंग’ योजना के तहत लगभग 160 विद्यार्थी प्रशिक्षण ले रहे हैं।

यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के कौशल आधारित शिक्षा मॉडल के अनुरूप तैयार किया गया है, जिसमें व्यवहारिक अनुभव को शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। संकाय सदस्यों की निगरानी में छात्र खेत तैयार करने, नर्सरी विकसित करने, रोपाई करने, सिंचाई प्रबंधन, उर्वरकों के संतुलित उपयोग, कीट एवं रोग नियंत्रण, फसल की निगरानी, कटाई और उपज के विपणन तक की पूरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि विद्यार्थी केवल खेती की तकनीक नहीं सीख रहे, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से निर्णय लेना, लागत और उत्पादन का विश्लेषण करना तथा बाजार की मांग के अनुसार फसल प्रबंधन भी सीख रहे हैं।

फसल की बिक्री से होने वाली आय का लाभ भी विद्यार्थियों को मिलेगा, जिससे उनमें कृषि उद्यमिता की भावना विकसित होगी। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप ने कहा कि संस्थान का लक्ष्य केवल डिग्रीधारी तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे कृषि वैज्ञानिक तैयार करना है जो व्यवहारिक ज्ञान, तकनीकी दक्षता और नवाचार की सोच के साथ कृषि क्षेत्र में बदलाव ला सकें। उनका कहना है कि खेत में मिलने वाला अनुभव विद्यार्थियों को भविष्य में शोध, तकनीक विकास और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए अधिक सक्षम बनाएगा।

हाल ही में विश्वविद्यालय पहुंचे केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस पहल की सराहना की। उन्होंने विद्यार्थियों के साथ धान की रोपाई कर उनका उत्साह बढ़ाया और कहा कि यह मॉडल देश के सभी कृषि विश्वविद्यालयों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है। उनके अनुसार, जब विद्यार्थी खेत में काम करते हुए सीखेंगे, तभी वे वास्तविक अर्थों में कृषि वैज्ञानिक बनकर भारतीय कृषि को नई दिशा और नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत 26 जून से हुई। प्रशिक्षण के लिए 10 हेक्टेयर कृषि भूमि को 20 प्लॉटों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक प्लॉट का क्षेत्रफल 0.5 हेक्टेयर है और इसकी जिम्मेदारी आठ विद्यार्थियों की एक टीम को सौंपी गई है।

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