हाथियों के लिए सुरक्षित बनेंगे गलियारे: CM धामी के निर्देश पर AI और कैमरा ट्रैप से लैस होंगे उत्तराखंड के कॉरिडोर

देहरादून। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष को न्यूनतम करने और वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए धामी सरकार आधुनिक तकनीक का सहारा लेने जा रही है। प्रदेश के सभी 11 प्रमुख एलिफेंट कॉरिडोर की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और कैमरा ट्रैप तकनीक से हाईटेक बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशों के बाद वन विभाग ने इसकी कसरत शुरू कर दी है, जिसका उद्देश्य हाथियों के प्राकृतिक मार्गों का संरक्षण करने के साथ-साथ जंगलों से सटे इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करना है। मुख्यमंत्री साफ कर चुके हैं कि एआई आधारित निगरानी प्रणाली को केवल हाथी कॉरिडोर तक सीमित न रखकर अन्य महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारों में भी लागू किया जाए।
कैमरा ट्रैप और स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम से मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण कर वन विभाग को वास्तविक समय में सूचना मिलेगी, जिससे संवेदनशील क्षेत्रों में त्वरित कार्रवाई संभव होगी। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि सरकार का उद्देश्य वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन, प्राकृतिक आवासों के संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी और वन्यजीव आधारित पर्यटन को नई मजबूती प्रदान करना है। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन के समन्वय से उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आने की उम्मीद जताई जा रही है। प्रदेश में वर्तमान में 11 प्रमुख हाथी कॉरिडोर चिन्हित हैं।
इनमें कासरो-बड़कोट, चीला-मोतीचूर, मोतीचूर-गोहरी, रावासन-सोनानदी (लैंसडौन), रावासन-सोनानदी (बिजनौर), दक्षिण पतली दून-चिल्किया, चिल्किया-कोटा, कोटा-मैलानी, फतेहपुर-गदयड़िया, गोला रोखड़-गौरई-टांडा तथा किलपुरा-खटीमा-सुरई कॉरिडोर शामिल हैं। इनमें से चार कॉरिडोर राजाजी नेशनल पार्क और तीन कॉर्बेट टाइगर रिजर्व क्षेत्र में स्थित हैं, जबकि शेष हाथियों के पारंपरिक आवाजाही मार्ग हैं। इन कॉरिडोरों का वैज्ञानिक सर्वे वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) के विशेषज्ञों की देखरेख में किया जा रहा है।
सर्वे के दौरान यह अध्ययन किया जा रहा है कि हाथी किन मार्गों का नियमित उपयोग कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी आवाजाही प्रभावित हो रही है और किन स्थानों पर संरक्षण की तत्काल आवश्यकता है। इसके अलावा प्राकृतिक भोजन, जल स्रोत, वनस्पतियों की उपलब्धता तथा अवैध अतिक्रमण, सड़क, रेलवे लाइन और अन्य मानवीय गतिविधियों से पैदा हो रही बाधाओं की भी पहचान की जा रही है।



