उत्तराखंड

पहाड़ी किसानों की बदलेगी तकदीर, झंगोरे की खेती को मिला तकनीक और एमएसपी (MSP) का संबल

Dehradun, 24 August, 2026। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक खेती को अधिक सुरक्षित, किफायती और मुनाफा देने वाली बनाने के लिए कृषि विभाग ने ‘सिस्टम ऑफ मिलेट इंटेंसिफिकेशन’ (SMI) पद्धति की शुरुआत की है। उत्तरकाशी से शुरू हुए इस प्रयोग में बर्नयार्ड मिलेट (झंगोरे) को सीधे खेत में बोने के बजाय पहले नर्सरी में तैयार कर निश्चित दूरी पर रोपा जाता है, जिससे प्रति एकड़ सिर्फ 150 ग्राम बीज की खपत होती है और उत्पादन 2 से 3 गुना तक बढ़ जाता है। जैविक खाद, कम लागत और 52.5 रुपये प्रति किग्रा प्रस्तावित एमएसपी (MSP) के साथ यह तकनीक न केवल किसानों की आय बढ़ाएगी, बल्कि पौष्टिक मिलेट्स को स्कूली भोजन से जोड़कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती देगी। उत्तरकाशी से शुरू हुआ यह प्रयोग सफल रहा तो यह पहाड़ी किसानों के लिए खेती का नया रास्ता खोल सकता है।

नई पद्धति पारंपरिक तरीके से काफी अलग है। इसमें खेत में सीधे अधिक मात्रा में बीज डालने के बजाय पौधों को पहले नर्सरी में तैयार किया जाता है। करीब 15 से 21 दिन तक पौध तैयार होने के बाद उसे खेत में निश्चित दूरी पर रोपा जाता है। पौधों के बीच लगभग 10×12 इंच की दूरी रखी जाती है। इससे पौधों को पर्याप्त जगह और पोषक तत्व मिलने के साथ जड़ों के बेहतर विकास की संभावना रहती है। कृषि निदेशक दिनेश कुमार के अनुसार एसएमआई पद्धति से मिलेट की पैदावार दो से तीन गुना तक बढ़ सकती है और खेती की लागत भी कम हो सकती है। तकनीक में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाकर खेत में उपलब्ध जैविक खाद तथा बेहतर कृषि प्रबंधन पर जोर दिया जाता है। इससे मिट्टी में हवा का संचार बेहतर होने, जड़ों की वृद्धि मजबूत होने और सूखे जैसी परिस्थितियों में फसल की सहनशीलता बढ़ने की उम्मीद है।

बर्नयार्ड मिलेट के सामने अभी न्यूनतम समर्थन मूल्य का अभाव बड़ी चुनौती है। कृषि विभाग इसे एमएसपी के दायरे में लाने के लिए वित्त विभाग से बातचीत कर रहा है। प्रस्तावित समर्थन मूल्य कम से कम 52.5 रुपये प्रति किलोग्राम रखने की बात कही गई है। यदि मंजूरी मिलती है तो किसानों को मूल्य सुरक्षा मिलेगी और सांवा की खेती के प्रति उनका भरोसा और बढ़ सकता है। सरकार बर्नयार्ड मिलेट से तैयार व्यंजनों को स्कूलों के भोजन में शामिल करने की योजना पर भी काम कर रही है। इसका उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के साथ स्थानीय मिलेट की खपत बढ़ाना है।

मिलेट उत्पादक श्वेता बंधानी के अनुसार सांवा फाइबर, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है। इसके नियमित सेवन को बेहतर रक्त शर्करा नियंत्रण और पाचन स्वास्थ्य से भी जोड़ा जाता है। उत्तराखंड पहले से ही बर्नयार्ड मिलेट उत्पादन में देश के प्रमुख राज्यों में है। कृषि विभाग के अनुसार राज्य में करीब 28,250 हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती होती है और सालाना उत्पादन लगभग 40,200 मीट्रिक टन है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने वाली नई तकनीक का प्रयोग बड़े स्तर पर सफल होता है तो इसका सीधा फायदा किसानों को मिल सकता है।

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