उत्तराखंड में जलस्रोतों के संरक्षण के लिए बनेगा ‘स्प्रिंग एटलस’, 11 जिलों में 46 हजार से अधिक स्रोतों का सर्वे पूरा

Dehradun, 25 October, 2026। उत्तराखंड में सूखते प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाने और उनके दीर्घकालिक संरक्षण के लिए अब वैज्ञानिक आधार पर रणनीति तैयार की जा रही है। इसके तहत राज्यभर के नौलों, धारों और अन्य जलस्रोतों की गणना कर ‘स्प्रिंग एटलस’ बनाया जा रहा है। जनवरी से जारी इस अभियान के तहत 11 जिलों में अब तक 46,358 सक्रिय व सूख चुके जलस्रोतों का सर्वे पूरा कर लिया गया है। केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय के निर्देशों पर लघु सिंचाई विभाग द्वारा कराया जा रहा यह सर्वे दिसंबर तक पूरा होगा, जिसके बाद प्राप्त आंकड़ों के आधार पर प्रभावित क्षेत्रों में जलस्रोतों के पुनर्जीवन और संरक्षण की विशेष कार्ययोजना लागू की जाएगी। मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड में प्राकृतिक जलस्रोत पेयजल और स्थानीय जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में बड़ी आबादी आज भी नौलों, धारों और अन्य प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर है। हालांकि, कई इलाकों में जलस्रोतों का पानी कम होने और उनके सूखने की समस्या गंभीर होती जा रही है। ऐसे में स्प्रिंग एटलस के माध्यम से जलस्रोतों की स्थिति का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा, जिससे संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सके। स्प्रिंग एटलस तैयार करने के लिए केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय के निर्देशों के क्रम में लघु सिंचाई विभाग के माध्यम से सर्वे कराया जा रहा है। इसके तहत जलस्रोतों की भौगोलिक स्थिति, अक्षांश-देशांतर, पानी की उपलब्धता और अन्य जरूरी जानकारियां दर्ज की जा रही हैं। संबंधित स्रोतों की तस्वीरें भी जलशक्ति मंत्रालय के पोर्टल पर अपलोड की जा रही हैं।
सर्वे में केवल सक्रिय जलस्रोतों की जानकारी ही नहीं जुटाई जा रही, बल्कि पूरी तरह सूख चुके स्रोतों का ब्योरा भी दर्ज किया जा रहा है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किन क्षेत्रों में जलस्रोत बेहतर स्थिति में हैं और कहां पानी का प्रवाह घटने या स्रोत सूखने का खतरा अधिक है। लघु सिंचाई विभाग के विभागाध्यक्ष बीके तिवारी के अनुसार, जलस्रोतों की गणना जिलेवार कराई जा रही है। सर्वे से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर स्प्रिंग एटलस तैयार किया जाएगा। इससे जलस्रोतों की मौजूदा स्थिति को समझने के साथ संरक्षण संबंधी कार्यों की प्राथमिकताएं तय करने में भी मदद मिलेगी।
आंकड़ों के विश्लेषण के बाद जिन क्षेत्रों में जलस्रोतों के सूखने का खतरा अधिक होगा, वहां पुनर्जीवन और संरक्षण के विशेष प्रयास किए जा सकेंगे। साथ ही उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए योजनाओं को जरूरत के अनुरूप लागू करने में सहायता मिलेगी। दिसंबर तक गणना पूरी होने के बाद तैयार होने वाला स्प्रिंग एटलस प्रदेश में प्राकृतिक जलस्रोतों के दीर्घकालिक संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।


