उत्तराखंड

शाहबानो से बिल्किस बानो तक… विधानसभा में गूंजे महिला न्याय के सवाल; सत्ता और विपक्ष में छिड़ा जुबानी युद्ध

देहरादून। सदन के भीतर आज महिला सुरक्षा और न्याय का मुद्दा सियासी नूराकुश्ती में बदल गया। मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस पर हमलावर होते हुए कहा कि शाहबानो केस में संसद का इस्तेमाल कर कोर्ट का फैसला बदलना महिलाओं के साथ सबसे बड़ा अन्याय था। वहीं, विपक्ष ने मणिपुर की हिंसा और उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी केस को उठाकर सरकार के ‘नारी वंदन’ दावों को केवल दिखावा करार दिया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि शाहबानो केस के समय पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के जरिए पलटकर न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाई थी। उन्होंने इसे महिलाओं के अधिकारों के साथ समझौता बताते हुए कहा कि वर्तमान सरकार महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है और राज्य में कई योजनाएं इसी दिशा में लागू की जा रही हैं।

वहीं नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार पर पलटवार करते हुए बिल्किस बानो मामले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि तब दोषियों की रिहाई कर दी गई। इतना ही नहीं जिस तरह से उनका स्वागत किया गया, उससे महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भाजपा सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल ही खड़े हुए। मणिपुर में हुई हिंसा का जिक्र करते हुए महिलाओं के साथ हुई बर्बरता को शर्म बताया और केंद्र सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। विपक्ष ने हरियाणा की महिला पहलवानों के आंदोलन, उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड और राज्य में हाल के आपराधिक मामलों को भी जोर-शोर से उठाया। आर्य ने कहा कि चंपावत और चमोली जिलों में दलित बच्ची और किशोरी के साथ दुष्कर्म की घटनाएं सरकार के दावों की पोल खोलती हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में भाजपा शासित राज्यों का रिकार्ड खराब है।

वर्ष 1985 में शाहबानो का मामला सड़क से लेकर संसद तक सुर्खियों में रहा था । इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया था। बाद में तत्कालीन सरकार ने संसद में कानून बनाकार इस फैसले को सीमित कर दिया। यह मामला आज भी महिला अधिकार और न्यायपालिका की भूमिका पर बहस का केंद्र बना हुआ है। यह मामला वर्ष 2002 गुजरात दंगों से जुड़ा है। इस दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म और परिवार के सदस्यों की हत्या हुई थी। दोषियों को सजा मिली, लेकिन बाद में उनकी रिहाई ने विवाद खड़ा किया। सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर रिहाई को रद्द किया। यह मामला न्याय, महिला सुरक्षा और कानून व्यवस्था को लेकर चर्चा में रहा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button