नैनीताल दौरे पर ओम बिरला: वन संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय विकास में पंचायतों की भूमिका अहम

नैनीताल। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नैनीताल में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम के दौरान वन पंचायतों और शहरी निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को संबोधित किया। उन्होंने वन संसाधनों के संरक्षण के लिए 1930 के दशक से चले आ रहे प्रयासों और स्थानीय समुदायों के ऐतिहासिक विरोध का जिक्र करते हुए वर्तमान नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया। सांसद अजय भट्ट की मौजूदगी में हुए इस संवाद कार्यक्रम में बिरला ने सतत विकास के लिए जनभागीदारी को सबसे बड़ा हथियार बताया। लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने बुधवार को नैनीताल में डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया प्रशासनिक अकादमी में वन पंचायत प्रतिनिधियों तथा त्रिस्तरीय पंचायत व स्थानीय शहरी निकायों के निर्वाचित सदस्यों को संबोधित किया। उन्होंने सतत विकास और पारिस्थितिक संतुलन को सुनिश्चित करने के लिए सभी हितधारकों, सरकारी संस्थानों, पंचायती राज संस्थाओं, नगरीय निकायों, वन पंचायतों और नागरिकों की संयुक्त एवं सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का सम्मान करना दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता और राष्ट्रीय प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है। कहा कि औपनिवेशिक काल में वन संसाधनों के दोहन के खिलाफ स्थानीय समुदायों ने मजबूती से विरोध किया था। उन्होंने कहा कि देश में वर्ष 1930 के दशक से वन संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास हुए हैं। उन्होंने इन नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर जोर दिया। कहा कि जलवायु परिवर्तन आज विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, जिससे निपटने के लिए जनभागीदारी अत्यंत आवश्यक है। इस अवसर पर सांसद अजय भट्ट के साथ ही हितधारक, पंचायती राज संस्थाओं, नगरीय निकायों, वन पंचायतों के अधिकारी मौजूद रहे। बिरला ने कहा कि उत्तराखंड की वन पंचायतें सामुदायिक भागीदारी आधारित वन प्रबंधन का सफल मॉडल बनकर उभरी हैं। उन्होंने प्रतिनिधियों से सीधे संवाद कर उनके अनुभव, चुनौतियों और सुझाव भी सुने।
ओम बिरला ने जल, जंगल और जमीन को पारिस्थितिक संतुलन का आधार बताते हुए कहा कि इनका संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। लोकसभा अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली (लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट) के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल एक अभियान नहीं, बल्कि धरती को बचाने का प्रभावी मार्ग है। बिरला ने कहा कि उत्तराखंड का वन पंचायत मॉडल सामुदायिक भागीदारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो न केवल वनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, बल्कि पर्यावरण संतुलन और स्थानीय विकास में भी योगदान दे रहा है।



