उत्तराखंड में गहराया कृषि संकट: 5 साल में 63 हजार हेक्टेयर भूमि हुई बंजर, पलायन आयोग की रिपोर्ट में खुलासा

देहरादून। पहाड़ों से पलायन और खेती से विमुख होते युवाओं के कारण उत्तराखंड में कृषि का रकबा तेजी से सिकुड़ रहा है। राज्य पलायन आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार पांच साल में प्रदेश में कुल 63,291.42 हेक्टेयर भूमि बंजर हो गई है। यह भूमि केवल पौड़ी, टिहरी और अल्मोड़ा जिलों में है।
गुरुवार को वन्य जीवों के कारण खेती को हो रहे नुकसान को लेकर पलायन आयोग ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपी। रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बंजर भूमि का सबसे अधिक असर पर्वतीय जिलों में देखने को मिला है। सर्वाधिक गंभीर स्थिति पौड़ी गढ़वाल में है। इसके बाद अल्मोड़ा और टिहरी गढ़वाल हैं। इन तीनों जिलों में ही राज्य की कुल बंजर भूमि का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा केंद्रित है। इसके अलावा बागेश्वर, चंपावत, पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जैसे अन्य पर्वतीय जिलों में भी कृषि भूमि का उपयोग घट रहा है। वहीं मैदानी जिलों ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति बनी हुई है, जहां सिंचाई, बाजार और संसाधनों की उपलब्धता के कारण खेती अभी भी सक्रिय है।
खेती छोड़ने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान, सिंचाई सुविधाओं की कमी, छोटे और बिखरे खेत, बाजार तक पहुंच का अभाव और युवाओं का रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इन परिस्थितियों के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमशक्ति की कमी भी बढ़ रही है, जिससे खेती और अधिक प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि लगातार बढ़ती बंजर भूमि का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। पारंपरिक कृषि प्रणाली कमजोर हो रही है और खाद्य उत्पादन में गिरावट की आशंका बढ़ रही है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि कृषि को पुनर्जीवित करने के लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, फसल सुरक्षा के प्रभावी उपाय, आधुनिक तकनीकों का उपयोग और किसानों को बाजार से बेहतर जोड़ने की दिशा में काम करना होगा। साथ ही स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाकर पलायन को रोकने की भी आवश्यकता है। उत्तराखंड में पांच वर्षों में 63 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि का बंजर होना केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असंतुलन का संकेत है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति राज्य के ग्रामीण ताने-बाने और भविष्य दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती
पौड़ी गढ़वाल में 19,744.51 हेक्टेयर भूमि बंजर हो चुकी है, जो राज्य में सबसे अधिक है। इसके बाद अल्मोड़ा में 15,887.17 हेक्टेयर और टिहरी गढ़वाल में 8,654.48 हेक्टेयर भूमि खेती के उपयोग से बाहर हो गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की एक अध्ययन रिपोर्ट में उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चंपावत अत्यधिक जोखिम श्रेणी में रखा गया है। वहीं चमोली व पौड़ी ‘उच्च जोखिम’ श्रेणी में शामिल किया गया है।



