पौड़ी का ब्रिटिशकालीन कलेक्ट्रेट भवन बना ‘हेरिटेज सेंटर’

पौड़ी गढ़वाल। कभी ब्रिटिश हुकूमत से लेकर स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक फैसलों का साक्षी रहा पौड़ी का ऐतिहासिक कलेक्ट्रेट भवन अब एक नए रूप में अवतरित होने जा रहा है। 1850 में बने पत्थरों के इस भव्य भवन की दीवारें अब सिर्फ प्रशासनिक फाइलों का हिसाब नहीं रखेंगी, बल्कि गढ़वाल की समृद्ध लोक संस्कृति, अदम्य साहस, आध्यात्मिक चेतना और निसर्ग सुंदरता की कहानियाँ सुनाएँगी।
करीब 185 वर्षों का इतिहास खुद में समेटे इस भवन का अंतिम चरण में पहुँचा जीर्णोद्धार इसे एक भव्य ‘हेरिटेज सेंटर’ में तब्दील कर रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने और पर्यटकों को उत्तराखंड की आत्मा से रूबरू कराने का एक जीवंत माध्यम बनेगा। पौड़ी जिले की स्थापना वर्ष 1840 में हुई थी। शुरुआती वर्षों में प्रशासन अलग-अलग भवनों से संचालित होता रहा। इसके बाद वर्ष 1850 में कलेक्ट्रेट भवन का निर्माण शुरू हुआ, जिसे पूरा होने में 11 वर्ष लगे। उस समय इस भवन पर लगभग 1.60 लाख रुपये की लागत आई थी।
ब्रिटिश शासन के भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) अधिकारियों से लेकर स्वतंत्र भारत की भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) तक, इस भवन ने शासन व्यवस्था के अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव देखे हैं। वर्ष 2021 में नए कलेक्ट्रेट भवन में प्रशासनिक कार्यालय स्थानांतरित होने के बाद इस ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित करने की पहल शुरू हुई। तत्कालीन जिलाधिकारी धीराज गर्ब्याल ने इसे हेरिटेज भवन बनाने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया, जिसका शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने किया। इसके बाद डॉ. आशीष चौहान और वर्तमान जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया ने भी इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाया।
भवन के पुनरुद्धार पर 3.11 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि इसे संग्रहालय और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए 4.91 करोड़ रुपये का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। यहीं नहीं, परिसर के समीप चित्तौड़गढ़ के विजय स्तंभ की तर्ज पर शौर्य स्तंभ भी बनाया जा रहा है। यह स्मारक पौड़ी के वीर सपूतों को समर्पित होगा और यहां अमर शौर्य ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित रहेगी। तैयार होने के बाद यह पूरा परिसर केवल एक इमारत नहीं, बल्कि गढ़वाल की आत्मा, अस्मिता और गौरव का जीवंत दस्तावेज बनकर उभरेगा।
जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया ने कहा, “पौड़ी का हेरिटेज भवन हमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यहां जिले के इतिहास, लोक संस्कृति, वीरगाथाओं, धार्मिक परंपराओं और प्राकृतिक धरोहर को आधुनिक एवं आकर्षक स्वरूप में प्रदर्शित किया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके और पर्यटकों को भी गढ़वाल की समृद्ध विरासत को करीब से जानने का अवसर मिले।”
हेरिटेज भवन के भीतर पांच विशेष दीर्घाएं तैयार की जाएंगी। विरासत भूमि में पौड़ी के इतिहास की यात्रा दिखाई जाएगी, वीर भूमि में जिले के रणबांकुरों की शौर्यगाथाएं जीवंत होंगी। लोक संस्कृति दीर्घा में पारंपरिक वाद्ययंत्र, आभूषण, वेशभूषा और ग्रामीण जीवन की झलक मिलेगी। तपो भूमि में जिले के प्रमुख धार्मिक स्थलों का इतिहास और महत्व प्रदर्शित होगा, जबकि प्रकृति लोक पौड़ी की जैव विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य को सजीव रूप में प्रस्तुत करेगा। इतिहास की इस यात्रा के साथ यहां स्वाद भी पहाड़ का होगा। ‘रस परंपरा’ नाम से बनने वाले कैफे में झंगोरे की खीर, मंडुवे की रोटी, काफली, फाणु, चैंसू और भट की चुड़कानी जैसे पारंपरिक व्यंजन परोसे जाएंगे।



