उत्तराखंड

उत्तराखंड की ‘कोव देबर’ भेड़ को मिली राष्ट्रीय पहचान: ICAR ने स्वदेशी नस्ल के रूप में दी आधिकारिक मान्यता

Dehradun, 06 September, 2026। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पीढ़ियों से पाली जा रही ‘कोव देबर’ भेड़ ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी खास पहचान दर्ज कराई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने इस विशिष्ट काली भेड़ को देश की स्वदेशी नस्ल के रूप में औपचारिक मान्यता दे दी है। इसके साथ ही ‘कोव देबर’ ICAR से आधिकारिक पहचान पाने वाली उत्तराखंड की पहली भेड़ नस्ल बन गई है, जिससे इसके आनुवंशिक संरक्षण और पहाड़ी पशुपालकों की आजीविका सुधारने के नए रास्ते खुलेंगे। इस नस्ल की खासियत केवल इसका रंग-रूप नहीं है।

कोव देबर स्थानीय परिस्थितियों में कम संसाधनों के बीच भी पलने की क्षमता रखती है। यह मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में उपलब्ध स्थानीय वनस्पतियों पर निर्भर रहती है। ऐसे में इसका पारंपरिक पालन पहाड़ के ग्रामीण परिवारों के लिए पशुधन और अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण साधन रहा है। इस पंजीकरण प्रक्रिया में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर के पशु आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग के प्रोफेसर बीएन शाही की अहम भूमिका रही। वह इस परियोजना के प्रमुख वैज्ञानिक रहे हैं। उन्होंने कहा कि नस्ल की यह मान्यता संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन के लिए नए रास्ते खोलेगी। बीएन शाही के अनुसार, पंजीकरण के बाद नस्ल संरक्षण, वैज्ञानिक प्रजनन, आनुवंशिक सुधार, जर्मप्लाज्म संरक्षण और किसान-केंद्रित पशुधन विकास पर काम की संभावनाएं बढ़ेंगी। इससे भविष्य में कोव देबर के बेहतर प्रजनन, नस्ल संरक्षण और पशुपालकों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की दिशा में योजनाबद्ध प्रयास किए जा सकेंगे। यानी अब तक पहाड़ की ढलानों और गांवों तक सीमित कोव देबर की पहचान वैज्ञानिक दस्तावेजों में दर्ज हो गई है।

चुनौती अब इस पहचान को संरक्षण और पशुपालकों की समृद्धि में बदलने की है। कोव देबर की वैज्ञानिक पहचान तय करने के लिए 43 गांवों और 80 पशुपालकों से जानकारी जुटाई गई। इसके आधार पर नस्ल की शारीरिक विशेषताओं, पालन-पोषण की परिस्थितियों और विशिष्ट गुणों का अध्ययन किया गया। वैज्ञानिक परीक्षण और अध्ययन के बाद इसे स्वदेशी पशु आनुवंशिक संसाधन के रूप में दर्ज कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। कोव देबर भेड़ को लंबे समय से पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और चमोली के पहाड़ी इलाकों में पाला जाता रहा है। करीब 1600 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह भेड़ पहाड़ की जलवायु और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढाल चुकी है। इसका सबसे अलग रूप इसका काला शरीर, काले बाल और काली जीभ है। यही विशेषताएं इसे दूसरी भेड़ नस्लों से अलग पहचान देती हैं।

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