उत्तराखंड

चूल्हे-चौके से उद्यमिता तक: भैंसकोटी की महिलाओं ने बेकरी से बनाई नई पहचान

New Tehri, Sandeep Belwal, 02 September, 2026। कभी घर की चारदीवारी, खेती-किसानी और पशुपालन तक सीमित रहने वाली पहाड़ की महिलाओं ने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख दी है। थौलधार विकासखंड के भैंसकोटी गांव में ‘दिव्य ग्राम संगठन’ से जुड़ी सात ग्रामीण महिलाओं ने बेकरी उद्यम स्थापित कर खुद को सफल उद्यमी के रूप में स्थापित किया है। ग्रामोत्थान परियोजना के सहयोग, 6 लाख रुपये की वित्तीय सहायता, बैंक ऋण और स्वयं के अंशदान से कुल 10 लाख रुपये की लागत से शुरू हुई इस बेकरी यूनिट में आज मंडुवा बिस्किट, ब्रेड, बन और केक तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी स्थानीय बाजारों में खासी मांग है।

महिलाओं के इस प्रयास की सराहना करते हुए जिला ग्रामीण विकास अभिकरण की प्रभारी परियोजना निदेशक ज्योति ने बताया कि सही मार्गदर्शन और वित्तीय सहयोग से ग्रामीण इलाकों में टिकाऊ उद्यम खड़े किए जा सकते हैं। अब यह समूह अपने कारोबार का विस्तार कर गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार से जोड़ने की तैयारी में जुटा है। इन महिलाओं के इस बदलाव की शुरुआत जनवरी 2026 में हुई। सातों महिलाएं दिव्य ग्राम संगठन से जुड़ी हैं। संगठन के अंतर्गत शिवालय स्वयं सहायता समूह, संतोषी समूह और लक्ष्मी समूह की महिलाओं ने ग्रामोत्थान परियोजना के सहयोग से बेकरी उद्यम शुरू किया। उद्यम सर्वेक्षण के दौरान दिव्य ग्राम संगठन का चयन किया गया। परियोजना टीम के भौतिक सत्यापन के बाद संगठन को छह लाख रुपये की परियोजना सहायता उपलब्ध कराई गई। बेकरी कारोबार को खड़ा करने के लिए महिलाओं ने भी अपनी भागीदारी निभाई।

छह लाख रुपये की परियोजना सहायता के साथ तीन लाख रुपये का बैंक ऋण और एक लाख रुपये का स्वयं का अंशदान जुटाया गया। इस तरह कुल 10 लाख रुपये की लागत से बेकरी यूनिट स्थापित हुई। मशीनों और जरूरी उपकरणों की खरीद के बाद महिलाओं ने उत्पादन शुरू किया और देखते ही देखते उनका कारोबार स्थानीय बाजार तक पहुंच गया। प्रभारी परियोजना निदेशक, जिला ग्रामीण विकास अभिकरण ज्योति के अनुसार ग्रामोत्थान परियोजना का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को स्थानीय संसाधनों एवं उनकी क्षमता के अनुरूप स्वरोजगार से जोड़ना है।

भैंसकोटी की महिलाओं की सफलता बताती है कि सही मार्गदर्शन, वित्तीय सहयोग और मेहनत से पहाड़ के गांवों में भी टिकाऊ उद्यम खड़े किए जा सकते हैं। अब इन महिलाओं की नजर कारोबार के विस्तार पर है। वे उत्पादन बढ़ाने के साथ अन्य बाजारों तक पहुंच बनाना चाहती हैं और गांव की दूसरी महिलाओं को भी उद्यम से जोड़ने की तैयारी में हैं। भैंसकोटी की यह कहानी साबित करती है कि जब सरकारी योजना को महिलाओं की मेहनत मिलती है तो चूल्हे की रसोई भी आत्मनिर्भरता की फैक्ट्री बन सकती है।

महिलाओं ने बाजार की मांग के साथ स्थानीय स्वाद को भी कारोबार का आधार बनाया। उन्होंने मंडुवा बिस्किट, आटा बिस्किट, मशरूम बिस्किट, फैन, बन, ब्रेड और केक तैयार करना शुरू किया। इन उत्पादों की बिक्री थौलधार, कमांद, कांडीखाल और टिहरी के बाजारों में मांग के अनुसार की जा रही है। खासतौर पर मंडुवा और मशरूम जैसे स्थानीय उत्पादों से तैयार बिस्किट ने उनके कारोबार को अलग पहचान दी है। राजेश्वरी सकलानी बताती हैं कि पहले महिलाओं का जीवन घर-गृहस्थी और खेती-किसानी तक ही सीमित था। ग्रामोत्थान परियोजना से मिले सहयोग ने उन्हें अपनी क्षमता पहचानने और उसे उद्यम में बदलने का अवसर दिया। अब महिलाएं खुद उत्पाद तैयार करने के साथ बाजार की मांग समझ रही हैं और ऑर्डर के अनुसार उत्पादन कर रही हैं। छोटे स्तर से शुरू हुआ यह कारोबार अब महिलाओं के लिए नियमित आय का जरिया बन चुका है। बेकरी से हर महीने करीब 50 से 60 हजार रुपये की आय हो रही है, जिसमें लगभग 30 से 40 हजार रुपये शुद्ध लाभ के रूप में बच रहे हैं। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और परिवार की जरूरतों में उनकी भागीदारी बढ़ी है।

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