पिरुल से स्वच्छ ऊर्जा: केदारनाथ यात्रा मार्ग पर जंगलों की आग और अपशिष्ट से मिलेगी मुक्ति, बनेगी बायोमास फ्यूल पेलेट्स

Dehradun, 07 September, 2026। उत्तराखंड के जंगलों में हर साल गर्मियों में भीषण आग का कारण बनने वाली चीड़ की सूखी पत्तियां (पिरुल) अब केदारनाथ धाम की यात्रा में पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा का जरिया बनने जा रही हैं। एक अभिनव पहल के तहत पिरुल को खच्चरों के अपशिष्ट (लीद) के साथ मिलाकर ‘बायोमास फ्यूल पेलेट्स’ में बदला जा रहा है। यह परियोजना न केवल वनाग्नि के खतरे को कम करने और यात्रा मार्ग पर सफाई बनाए रखने में मददगार साबित होगी, बल्कि पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता घटाकर श्रद्धालुओं के लिए खाना बनाने और गर्म पानी की सुविधा भी उपलब्ध कराएगी। स्थानीय समूहों को रोजगार से जोड़कर बनाई गई यह योजना पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। केदारनाथ यात्रा मार्ग पर शुरू किए गए इस प्रयोग के दौरान करीब 20 टन खच्चर की लीद और 250 क्विंटल चीड़ की पत्तियां एकत्र की गईं। दोनों जैविक अपशिष्ट को निर्धारित अनुपात में मिलाकर पेलेट्स तैयार किए गए। ट्रायल में करीब सात टन बायोमास फ्यूल तैयार हुआ है।
अधिकारियों के मुताबिक अब परियोजना को आगे बढ़ाते हुए संयंत्र की क्षमता बढ़ाने की तैयारी है, ताकि प्रतिदिन करीब एक टन पेलेट्स तैयार किए जा सकें। उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ की पत्तियां बड़ी मात्रा में जमीन पर गिरती हैं। गर्मी बढ़ने के साथ ये पत्तियां बेहद ज्वलनशील हो जाती हैं और जंगल में आग फैलने का बड़ा माध्यम बनती हैं। ऐसे में पिरुल को जंगल से हटाकर उपयोगी ईंधन में बदलना वनाग्नि के खतरे को कम करने की दिशा में भी अहम कदम माना जा रहा है। खास बात यह है कि पिरुल को केवल जंगलों से हटाने के बजाय इसे स्थानीय स्तर पर रोजगार और ऊर्जा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। परियोजना में हिमालयन इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट, इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट के निदेशक उदित घिल्डियाल की संस्था भी सहयोग कर रही है। घिल्डियाल के अनुसार शुरुआती ट्रायल सफल रहा है। यात्रा मार्ग की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में मशीनरी और बिजली की व्यवस्था चुनौतीपूर्ण रही, लेकिन इसके बावजूद परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है।
तैयार पेलेट्स को केदारनाथ मार्ग के ढाबों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए करीब 20 बायोमास फ्यूल स्टोव उपलब्ध कराए गए हैं। आगे इन्हीं पेलेट्स से बॉयलर और गीजर चलाकर यात्रियों को गर्म पानी उपलब्ध कराने की योजना है। इससे पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
पर्यटन सचिव धीराज सिंह गर्ब्याल ने कहा कि यह परियोजना पर्यावरण के अनुकूल और लागत प्रभावी है। उनके मुताबिक पिरुल और खच्चरों के अपशिष्ट का उपयोग कर यात्रा मार्ग की एक बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है। परियोजना से स्थानीय लोगों और स्वयं सहायता समूहों को भी जोड़े जाने की योजना है, जिससे पिरुल एकत्र करने के बदले उन्हें आर्थिक लाभ मिल सके।



