उत्तराखंड में मौसम निगरानी का डिजिटल युग, ‘विंडस’ प्रणाली से गांव-गांव तक पहुंचेगा सटीक मौसम डेटा

देहरादून। पहाड़ों में अचानक बदलते मौसम, बादल फटने और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए उत्तराखंड में मौसम निगरानी तंत्र को पूरी तरह हाईटेक बनाया जा रहा है। केंद्र सरकार की मौसम सूचना नेटवर्क एवं डेटा प्रणाली (WINDS – विंडस) के तहत राज्य में स्वचालित मौसम केंद्र (AWS) और स्वचालित वर्षामापी यंत्र (ARG) स्थापित किए जा रहे हैं। इस पहल से न केवल गांव स्तर पर सटीक मौसम डेटा उपलब्ध होगा, बल्कि राज्य के किसानों और आपदा प्रबंधन विभाग को भी समय रहते सही जानकारी मिल सकेगी। केंद्र सरकार की मौसम सूचना नेटवर्क एवं डेटा प्रणाली देशभर में मौसम संबंधी आंकड़ों का मजबूत नेटवर्क तैयार करने की महत्वाकांक्षी पहल है। इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर मौसम का सटीक डेटा जुटाकर किसानों, मौसम वैज्ञानिकों और सरकारी एजेंसियों को समय पर जानकारी उपलब्ध कराना है।
यह नेटवर्क प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, कृषि परामर्श, जल संसाधन प्रबंधन और आपदा जोखिम कम करने में अहम भूमिका निभाएगा। उत्तराखंड उन सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल है, जहां पहले चरण में विंडस परियोजना लागू की जा रही है। इनमें उत्तराखंड के अलावा असम, हिमाचल प्रदेश, केरल, ओडिशा, पुडुचेरी और उत्तर प्रदेश हैं। देशभर में अब तक 16,843 स्थानों पर स्वचालित मौसम केंद्र और स्वचालित वर्षामापी यंत्र लगाने की मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें 1,188 स्थानों पर सिविल कार्य पूरा हो चुका है, जबकि 892 उपकरण स्थापित किए जा चुके हैं। भारतीय मौसम विज्ञान केंद्र के प्रमुख मृत्युंजय महापात्र के अनुसार देश में विंडस नेटवर्क का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। इस पहल से मौसम आधारित कृषि को बढ़ावा मिलेगा, फसल बीमा प्रणाली अधिक पारदर्शी बनेगी।
विंडस से मिलने वाला डेटा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत फसल नुकसान के वैज्ञानिक आकलन में भी उपयोग होगा। इसके अलावा बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी तथा समय रहते चेतावनी जारी करने में भी यह नेटवर्क प्रशासन की मदद करेगा। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्यों में खेती के साथ-साथ आपदा प्रबंधन भी अधिक प्रभावी हो सकेगा। विंडस के तहत दो तरह के आधुनिक उपकरण लगाए जाते हैं। पहला ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन जो तापमान, आर्द्रता, हवा की गति और दिशा, वायु दाब समेत कई मौसम संबंधी आंकड़े स्वतः रिकॉर्ड करता है। दूसरा ऑटोमैटिक रेन गेज जो किसी क्षेत्र में हुई वर्षा की सटीक मात्रा मापता है। इन उपकरणों से प्राप्त जानकारी ऑनलाइन केंद्रीय सर्वर तक पहुंचती है, जहां उसका विश्लेषण कर हाइपर लोकल मौसम डेटा तैयार किया जाता है। यानी गांव या छोटे क्षेत्र के स्तर तक मौसम की सटीक जानकारी उपलब्ध हो जाती है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में, जहां कुछ किलोमीटर की दूरी पर भी मौसम बदल जाता है, यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित होगी। किसान समय पर बुवाई, सिंचाई, दवा छिड़काव और फसल कटाई का सही निर्णय ले सकेंगे। वहीं भारी बारिश, ओलावृष्टि या खराब मौसम की पहले से जानकारी मिलने पर फसलों का नुकसान कम किया जा सकेगा।



