गुलदार और बाघ के हमलों का पैटर्न और मानसून का प्रभाव

Dehradun, 21 August, 2026। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की तस्वीर बदल रही है। 20 सालों के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले एक शोध से यह बात स्पष्ट हुई है कि राज्य में गुलदार (तेंदुआ) और बाघ के हमलों का पैटर्न एक-दूसरे से काफी अलग है। जहां मानसून के दौरान खेतों की घनी फसलों के बीच छिपकर गुलदार अधिक हमले करते हैं, वहीं गर्मियों में वन उपज जुटाने जंगल जाने वाले लोगों पर बाघों का हमला बढ़ जाता है। दोनों ही प्रजातियों के बढ़ते हमलों और उनकी अलग आदतों को देखते हुए अब मौसम और प्रजाति के अनुसार अलग सुरक्षा रणनीति तैयार करने की जरूरत है। पालमपुर के शोधकर्ता अमनदीप राठी ने सेवानिवृत्त मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डॉ. राजीव भरतरी और भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व डीन डॉ. वाईवी झाला के मार्गदर्शन में वर्ष 2000 से 2019 तक उत्तराखंड में हुए 132 बाघ और 1,914 गुलदार हमलों का विश्लेषण किया।
अध्ययन के अनुसार दोनों प्रजातियों के हमलों में समय के साथ वृद्धि दर्ज हुई है। अध्ययन में गुलदार को बेहद अनुकूलनशील और मायावी बताया गया है। राज्य में औसतन 98 गुलदार हमले प्रतिवर्ष दर्ज हुए, जिनमें 22.3 प्रतिशत जानलेवा रहे। मानसून में खेतों में फसल का घना आवरण गुलदारों को छिपने का बेहतर अवसर देता है, जिससे हमले बढ़ जाते हैं। गुलदारों के हमले जंगलों के साथ खेतों और बस्तियों के आसपास भी अधिक पाए गए। कम और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में संघर्ष का खतरा ज्यादा रहता है। बाघों के औसतन सात हमले प्रतिवर्ष दर्ज हुए, लेकिन इनमें 34.8 प्रतिशत घातक रहे। गर्मियों में ग्रामीण घास, लकड़ी और अन्य वन उपज जुटाने तथा वानिकी कार्यों के लिए अधिक संख्या में जंगल जाते हैं। इसी दौरान बाघों से सामना बढ़ने का खतरा रहता है। बाघों के हमले मुख्य रूप से जंगलों, संरक्षित क्षेत्रों और कम आबादी वाले इलाकों में हुए। अध्ययन में हमलों की बढ़ती आवृत्ति का संबंध बाघों की बढ़ती आबादी से भी जोड़ा गया है।
दोनों वन्यजीवों के हमलों में वयस्क पुरुष सबसे अधिक प्रभावित हुए, लेकिन बच्चों और महिलाओं के मामले में हमले अधिक घातक रहे। शोध में जंगल पर निर्भरता घटाने, सुरक्षित घर, शौचालय, पेयजल और बिजली की सुविधा बढ़ाने की सिफारिश की गई है। साथ ही वैकल्पिक आजीविका, मवेशियों को सुरक्षित बाड़ों में रखना, स्टाल फीडिंग और जंगल से सटे खेतों में समूह बनाकर दिन में काम करने जैसे उपायों पर जोर दिया गया है। संवेदनशील क्षेत्रों में जरूरत के अनुसार फेंसिंग और बच्चों-बुजुर्गों की विशेष निगरानी से भी खतरा कम किया जा सकता है।



