उत्तराखंड

भारतीय वन्यजीव संस्थान का अध्ययन: गंगा तटीय पारिस्थितिकी में वनस्पति विविधता और मानवीय हस्तक्षेप के प्रभाव

Dehradun, 05 October, 2026। गंगोत्री से पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर तक गंगा नदी के लगभग 2,500 किलोमीटर लंबे प्रवाह क्षेत्र में वनस्पतियों की अद्भुत और व्यापक विविधता दर्ज की गई है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून के एक नवीनतम अध्ययन के अनुसार, गंगा के तटीय क्षेत्रों में कुल 747 पादप टैक्सा की पहचान की गई है, जिनमें से 81 प्रतिशत प्रजातियां भारत की मूल (देशज) वनस्पति हैं। WII के 37वें वार्षिक शोध संगोष्ठी में प्रस्तुत यह अध्ययन गंगा के तीन प्रमुख क्षेत्रों—ऊपरी, मध्य और निचले बेसिन—में पौधों के वितरण, उनकी उपलब्धता और उन पर मानवीय हस्तक्षेप के प्रभावों का एक महत्वपूर्ण लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। डब्ल्यूआईआई के 37वें वार्षिक शोध संगोष्ठी में प्रस्तुत इस अध्ययन का शीर्षक ‘गंगा नदी के प्रवाह क्षेत्र में वनस्पति संरचना और विविधता के प्रतिरूप’ है।

शोधकर्ताओं ने गंगा के तटीय वनस्पति तंत्र का आकलन करते हुए प्रजातियों की उपलब्धता, उनके वितरण और अलग-अलग क्षेत्रों में वनस्पति संरचना का अध्ययन किया। तीन हिस्सों में बांटा गया गंगा बेसिन: अध्ययन के लिए गंगा नदी को तीन भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया। ऊपरी गंगा क्षेत्र में गंगोत्री से हरिद्वार तक का हिस्सा शामिल है। मध्य गंगा क्षेत्र हरिद्वार से बिहार के मैदानी इलाकों तक और निचला गंगा क्षेत्र बिहार से डायमंड हार्बर तक निर्धारित किया गया। शोधकर्ताओं ने पूरे क्षेत्र को पांच-पांच किलोमीटर की 35 जैव विविधता मूल्यांकन इकाइयों (बीईयू) में बांटकर वनस्पति का आकलन किया। अध्ययन में दर्ज 747 पादप टैक्सा में 735 आवृतबीजी, सात अनावृतबीजी और पांच टेरिडोफाइट प्रजातियां शामिल हैं। यह वर्गीकरण गंगा के किनारे मौजूद पौधों की विविधता को दर्शाता है।

जड़ी-बूटियों का रहा दबदबा वनस्पति समूहों में एस्टरेसी परिवार की हिस्सेदारी सर्वाधिक 50 प्रतिशत रही। इसमें मुख्य रूप से जड़ी-बूटियां और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों को सहन करने वाली प्रजातियां शामिल हैं। पोएसी परिवार में घास और बाढ़ प्रभावित मैदानी क्षेत्रों की वनस्पति आती है, जबकि फैबेसी परिवार में दलहनी पौधे, नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले वृक्ष और झाड़ियां शामिल हैं। डब्ल्यूआईआई की वरिष्ठ शोधकर्ता उमामा खान ने बताया कि गंगा के पूरे गलियारे में 747 पादप टैक्सा का मिलना इसकी उच्च वनस्पति विविधता को प्रदर्शित करता है।

  • ऊपरी गंगा में अधिक देशज प्रजातियां: उमामा खान के अनुसार ऊपरी गंगा क्षेत्र में देशज प्रजातियों की संख्या अधिक मिली और यहां वनस्पति संरचना भी विविधतापूर्ण रही। इसके विपरीत निचली गंगा में वनस्पति अपेक्षाकृत एकरूप पाई गई। अध्ययन में गैर-देशज प्रजातियों के विस्तार का भी उल्लेख किया गया है। शोधकर्ता के अनुसार ये प्रजातियां समशीतोष्ण क्षेत्रों से निचले क्षेत्रों तक फैली हैं। अध्ययन में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि नदी के समीप वनस्पति की अधिकता रही, लेकिन नदी से दूरी बढ़ने के साथ इसमें गिरावट दर्ज की गई। उमामा खान ने इसके लिए कृषि विस्तार, मानवीय बस्तियों, भूमि उपयोग में बदलाव और मानव हस्तक्षेप को प्रमुख कारण बताया। शोध के निष्कर्ष गंगा के तटीय क्षेत्रों में मूल वनस्पतियों के संरक्षण, जैव विविधता के आकलन और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन के लिए आधार प्रदान करते हैं। उमामा खान, वरिष्ठ शोधकर्ता, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून। अध्ययन में पश्चिम बंगाल में सर्वाधिक वनस्पति विविधता मिली, जबकि उत्तराखंड में सबसे कम दर्ज की गई। शोध के निष्कर्ष गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र में भौगोलिक बदलाव और मानवीय हस्तक्षेप के प्रभावों को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
  • क्या है टैक्सा:  टैक्सा (Taxa) पौधों के वैज्ञानिक वर्गीकरण की इकाइयां हैं। इनके जरिए पौधों को उनकी समान विशेषताओं के आधार पर समूहों में रखा जाता है। टैक्सा में प्रजाति, वंश और परिवार जैसे स्तर शामिल होते हैं। गंगा अध्ययन में 747 टैक्सा का अर्थ 747 अलग-अलग वर्गीकृत पादप समूहों से है।

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