उत्तराखंड

बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए सीबीआरआई की पहल: असम के गांवों में आपदा-रोधी आशियाने बनाने और 75% ऊर्जा बचाने की तकनीक का प्रदर्शन

Dehradun, 26 September, 2026। असम के बाढ़ प्रभावित गांवों में पुनर्वास को टिकाऊ बनाने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। सीएसआईआर-सीबीआरआई, रुड़की के वैज्ञानिकों ने जोरहाट के जुनाकीमंडल गांव में ‘स्मार्ट विलेज मिशन’ के तहत ग्रामीणों को कम लागत में बाढ़-रोधी मकान बनाने की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। इस दौरान इमारतों की रेट्रोफिटिंग के साथ-साथ आपदा के समय बिजली कटौती से निपटने के लिए 75 प्रतिशत ऊर्जा बचत वाली ‘सोलर-असिस्टेड हाइब्रिड तकनीक’ का भी सफल प्रदर्शन किया गया। भीषण बाढ़ से जुनाकीमंडल गांव में कई आवासीय भवनों, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और सामुदायिक सुविधाओं को नुकसान पहुंचा।

सीएसआईआर-सीबीआरआई के वैज्ञानिकों की टीम ने प्रभावित भवनों में संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक क्षति का आकलन किया। टीम ने मकानों के कमजोर हिस्सों की पहचान कर उनकी मरम्मत, रेट्रोफिटिंग और सुदृढ़ीकरण के उपाय भी सुझाए। वैज्ञानिकों का जोर केवल बाढ़ के बाद मकानों की मरम्मत पर नहीं, बल्कि भविष्य की आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने वाली निर्माण पद्धतियां अपनाने पर रहा। ‘आवास सक्षम’ कार्यक्रम में 150 से अधिक ग्रामीणों और पीएमएवाई-जी लाभार्थियों को सुरक्षित, किफायती और टिकाऊ आवास तकनीकों की जानकारी दी गई।

बाढ़ की संवेदनशीलता को देखते हुए प्लिंथ प्रोटेक्शन वॉल, नॉन-इरोडेड मड प्लास्टर, फायर-रिटार्डेंट थैच रूफ, बांस आधारित सुरक्षित आवास और भवनों की रेट्रोफिटिंग जैसी तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। इसका उद्देश्य स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए कम लागत में ऐसे घर तैयार करना है, जो आपदा के समय ज्यादा सुरक्षित रहें। सीबीआरआई वैज्ञानिकों ने सोलर-असिस्टेड हाइब्रिड तकनीक भी ग्रामीणों के सामने रखी। संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. चंदन स्वरूप मीणा ने यह प्रणाली विकसित की है। यह प्रणाली पानी गरम करने, स्पेस कंडीशनिंग और रसोई संबंधी जरूरतों में उपयोगी है। डॉ. मीणा के अनुसार, पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में इससे 75 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत संभव है।

बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में यह तकनीक ऊर्जा के वैकल्पिक और अपेक्षाकृत टिकाऊ स्रोत के रूप में उपयोगी हो सकती है। यह तकनीक सीएसआईआर-सीबीआरआई रुड़की में विकसित और सत्यापित की गई है तथा हिमाचल प्रदेश के कल्पा और लेह-लद्दाख में भी स्थापित की जा चुकी है।

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