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उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों पर पैनी नज़र: 13 ‘हाई रिस्क’ झीलों की वैज्ञानिक निगरानी शुरू

Dehradun, 30 September, 2026। हिमालयी क्षेत्रों में बदलते पर्यावरण और ग्लेशियरों के पिघलने से उत्पन्न खतरे को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने आपदा प्रबंधन की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। राहत कार्यों से ज्यादा अब ध्यान जोखिम की अग्रिम पहचान पर केंद्रित किया गया है। प्रदेश की कुल 344 ग्लेशियल झीलों में से अत्यंत संवेदनशील मानी गईं 13 ‘हाई रिस्क’ झीलों पर सेटेलाइट, अत्याधुनिक सेंसर और वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के जरिए पैनी नजर रखी जा रही है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और तकनीकी संस्थाओं के अध्ययन के आधार पर चिन्हित 13 संवेदनशील झीलों में बागेश्वर की एक, चमोली की चार, पिथौरागढ़ की छह, टिहरी की एक और उत्तरकाशी की एक झील शामिल है।

इन झीलों को लेकर चरणबद्ध तरीके से वैज्ञानिक अध्ययन और सर्वेक्षण किए जा रहे हैं। छह झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा हो चुका है, जिसमें झीलों की गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य जलवैज्ञानिक आंकड़े जुटाए गए हैं। राज्य सरकार ने निगरानी के लिए केंद्रीय और तकनीकी संस्थाओं के साथ समन्वय बढ़ाया है। हाल में विशेषज्ञ दलों को संवेदनशील झीलों के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए भेजा गया है। सरकार ने नियमित उपग्रह निगरानी, अत्याधुनिक सेंसर और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर जोखिम का आकलन करने पर भी जोर दिया है।

इसके साथ ही संभावित प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, सुरक्षित निकासी मार्ग, स्थानीय चेतावनी तंत्र और संचार व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है।

ग्लॉफ की स्थिति में तेज बहाव निचले इलाकों की बस्तियों के साथ सड़क, पुल, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य ढांचागत सुविधाओं को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सरकार अब ग्लेशियल झीलों में हो रहे बदलावों को लगातार रिकॉर्ड करने और खतरे के संकेत मिलते ही चेतावनी जारी करने की व्यवस्था विकसित कर रही है। उद्देश्य साफ है कि हिमालयी पारिस्थितिकी में हो रहे बदलावों के बीच संभावित आपदा के जोखिम को समय रहते पहचानना और नुकसान को न्यूनतम करना।

हिमालयी क्षेत्रों की छह झीलों का वैज्ञानिक और तकनीकी जांच के तहत बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा कर लिया गया है। इनमें चमोली की सरस्वती ताल और वसुधारा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल तथा पिथौरागढ़ की दारमा घाटी की मबांग, प्यूनग्रू और स्युंक्ति यांक्ति प्रोग्लेशियल झीलें शामिल हैं।

ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए राज्य स्तर पर केंद्रीय और तकनीकी संस्थाओं के साथ समन्वय किया जा रहा है। झीलों के जलस्तर, आकार में बदलाव और अन्य संभावित जोखिमों पर नियमित नजर रखी जा रही है।

विनोद कुमार सुमन, सचिव आपदा प्रबंधन

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