पहाड़ों में खेती का संकट, अल्मोड़ा और उत्तरकाशी में घटती उत्पादकता बनी पलायन की बड़ी वजह

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की कमजोर होती स्थिति अब एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक संकट का रूप ले चुकी है। ‘उत्तराखंड पलायन निवारण आयोग’ की होलिया रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के पहाड़ी जिलों में कृषि भूमि की घटती उपज और पैदावार में गिरावट के कारण लोग तेजी से गांव छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। इस संकट का सबसे बड़ा असर अल्मोड़ा (8.37%) और उत्तरकाशी (7.14%) जिलों में देखा गया है, जहां लोगों ने खेती के घाटे के सौदे में बदलने को ही अपने पलायन का मुख्य कारण बताया है। सिंचाई की कमी, जंगली जानवरों का आतंक और मौसम की अनिश्चितता के चलते राज्य का औसत कृषि-जनित पलायन 5.44 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो यह साफ संकेत देता है कि पहाड़ों को खाली होने से बचाने के लिए सबसे पहले पारंपरिक कृषि को पुनर्जीवित और सुरक्षित करना होगा।
आयोग की ओर से जारी जनपदवार आंकड़ों के अनुसार चंपावत में 6.31 प्रतिशत और टिहरी गढ़वाल में 6.17 प्रतिशत लोगों ने भी खेती की घटती उत्पादकता को पलायन की अहम वजह माना। पौड़ी गढ़वाल में यह आंकड़ा 5.35 प्रतिशत, नैनीताल में 4.94 प्रतिशत और चमोली में 4.73 प्रतिशत दर्ज किया गया है। पूरे राज्य का औसत 5.44 प्रतिशत है। रिपोर्ट बताती है कि खेती की कमजोर होती स्थिति अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रह गई, बल्कि यह सामाजिक बदलाव का कारण भी बन रही है।
पहाड़ों में पारंपरिक खेती लंबे समय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। सिंचाई सुविधाओं की कमी, अनियमित बारिश, मौसम में बदलाव और खेती योग्य जमीन का लगातार बंजर होना किसानों की मुश्किलें बढ़ा रहा है। इसके साथ ही बंदर, जंगली सूअर और अन्य वन्यजीव फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। कई गांवों में किसानों ने खेती करना ही छोड़ दिया है, क्योंकि मेहनत और लागत के मुकाबले उन्हें पर्याप्त उत्पादन नहीं मिल पा रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पलायन रोकना है तो पर्वतीय कृषि को फिर से मजबूत और लाभकारी बनाना होगा। कृषि आधारित रोजगार, आधुनिक खेती, सिंचाई योजनाएं और जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।



