बेदाग राजनीति और कड़े अनुशासन के प्रतीक थे भुवन चंद्र खंडूड़ी

किरण शर्मा, देहरादून। भारतीय राजनीति में ईमानदारी, कड़े अनुशासन और बेदाग छवि का जब भी जिक्र होगा, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (से.नि.) भुवन चंद्र खंडूड़ी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाएगा। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे भरोसेमंद ‘सिपहसालार’ और संकटमोचक रहे खंडूड़ी को अटल जी प्यार से ‘जनरल साहब’ कहते थे। दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ों तक, उन्होंने न केवल गठबंधन सरकार के संकटों को टाला, बल्कि देश की सबसे महत्वाकांक्षी ‘स्वर्णिम चतुर्भुज योजना’ और उत्तराखंड में चारधाम सड़क नेटवर्क की मजबूत नींव रखकर देश को विकास का एक नया राजमार्ग दिखाया। संसद में उत्तराखंड राज्य आंदोलन और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर जब भी बहस होती थी, खंडूड़ी अटल बिहारी वाजपेई के साथ मजबूती से खड़े नजर आते थे।
वर्ष 1994 में लोकसभा में उत्तराखंड के मुद्दे पर हुए वाकआउट में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। राजनीतिक हलकों में उन्हें अटल सरकार के “संकटमोचक” के रूप में भी देखा जाता था। वाजपेई सरकार के दौरान वर्ष 1999 में उन्हें भाजपा का मुख्य सचेतक बनाया गया। गठबंधन राजनीति के उस दौर में सरकार लगातार राजनीतिक दबावों और संकटों से जूझ रही थी। ऐसे समय में पार्टी सांसदों को एकजुट रखने और रणनीतिक समन्वय बनाने में खंडूरी की भूमिका बेहद अहम मानी गई। सेना की पृष्ठभूमि से आने वाले खंडूड़ी अपनी सख्त अनुशासनप्रिय छवि और साफ-सुथरी राजनीति के लिए पहचाने जाते थे। उन पर कभी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा, जिसके चलते अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें काम करने की पूरी स्वतंत्रता देते थे। उत्तराखंड में भी खंडूरी ने सड़क संपर्क को विकास की रीढ़ माना। उनका मानना था कि पहाड़ में सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन और सुरक्षा की जीवनरेखा है।
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क मजबूत करने, राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार और दुर्गम गांवों को मुख्य मार्गों से जोड़ने पर विशेष जोर दिया।चारधाम यात्रा मार्गों को सुरक्षित और सुगम बनाने की सोच को भी उन्होंने मजबूती दी। बाद में जिस चारधाम सड़क परियोजना ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई, उसकी शुरुआती अवधारणा और आधार तैयार करने का श्रेय भी काफी हद तक खंडूरी को दिया जाता है। बेहतर सड़क संपर्क से पर्यटन, व्यापार और स्थानीय रोजगार को नई गति मिली। यही कारण है कि आज भी उत्तराखंड में सड़क विकास की चर्चा होने पर ‘जनरल साहब’ का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। वर्ष 2000 में अटल सरकार ने उन्हें सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी। इसी दौरान देश की 5,846 किलोमीटर लंबी स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना को गति मिली, जिसने दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों को आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ दिया। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना के तहत इस विशाल कार्य का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा चार वर्षों में पूरा होना उनकी प्रशासनिक क्षमता का बड़ा उदाहरण माना जाता है।



