उत्तराखंड

उत्तरकाशी के सौली क्षेत्र में भू-धंसाव: चीड़ के झुके पेड़ और मकानों की दरारें दे रहीं बड़ी तबाही की दस्तक

Uttarkashi, 14 August, 2026। इस बरसात में हुई अतिवृष्टि के पश्चात नौगांव नगर पंचायत के सौली गांव में भू-धंसाव की गंभीर स्थिति उत्पन्न हुई है। जिलाधिकारी उत्तरकाशी के निर्देशों के क्रम में गठित विशेषज्ञ टीम द्वारा स्थल का तकनीकी निरीक्षण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र में जल निकासी की व्यवस्था न होने तथा ढलान की तलहटी में सड़क कटान के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ा है, जिससे भू-गतिशीलता (Geo-dynamism) की प्रक्रिया तीव्र हुई है। उत्तरकाशी जिले के नौगांव नगर पंचायत के वार्ड नंबर सात स्थित सौली गांव में लगातार बढ़ रहे भू-धंसाव की प्रारंभिक वैज्ञानिक तस्वीर सामने आई है। भूवैज्ञानिकों के स्थलीय निरीक्षण में प्रभावित क्षेत्र में करीब तीन से चार मीटर मोटी मिट्टी की परत मिली है। कई स्थानों पर इसके नीचे ठोस चट्टानों का सहारा दिखाई नहीं दिया।

विशेषज्ञों के अनुसार, मोटी मिट्टी की यह परत बारिश के पानी के लिए संवेदनशील माध्यम बन रही है। पानी के भीतर तक पहुंचने से ढलान की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। प्रथम दृष्टया यही प्रक्रिया क्षेत्र में भू-धंसाव और जमीन के खिसकने की प्रमुख वजहों में शामिल मानी जा रही है। जिलाधिकारी उत्तरकाशी के निर्देश पर गठित टीम ने सौली के आपदा प्रभावित क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण किया। सात और आठ अगस्त को हुई भारी बारिश के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग यमुनोत्री और नौगांव-स्यूरी मोटर मार्ग के बीच के हिस्से में जमीन में धंसाव बढ़ा था। इसके बाद आसपास के कई भवनों में दरारें आने की शिकायत सामने आई। भूवैज्ञानिक दृष्टि से किसी ढलान पर मोटी, अपेक्षाकृत ढीली या अपक्षयित मिट्टी की परत मौजूद होने पर लगातार वर्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

बारिश का पानी मिट्टी में प्रवेश कर नीचे की ओर रिसता है। यदि पानी का निकास पर्याप्त तेजी से नहीं हो पाता, तो मिट्टी के छिद्रों में पानी का दबाव बढ़ सकता है। इससे मिट्टी की प्रभावी शक्ति घट सकती है और ढलान पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर खिसकने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। निरीक्षण के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग और स्यूरी मार्ग के बीच कई चीड़ के पेड़ ढलान की दिशा में झुके पाए गए। विशेषज्ञों के लिए यह जमीन की संभावित धीमी गति से हो रही विकृति का संकेत हो सकता है।

हालांकि केवल पेड़ों का झुकाव भू-धंसाव का निर्णायक प्रमाण नहीं है, लेकिन यदि एक ही क्षेत्र में कई पेड़ समान दिशा में झुके हों और यह झुकाव जमीन की दरारों व भवनों के विस्थापन के साथ दिखाई दे, तो इसे भू-गतिशीलता के महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में देखा जाता है। स्थानीय ग्रामीणों ने टीम को बताया कि क्षेत्र में भू-धंसाव की समस्या राष्ट्रीय राजमार्ग के कटान के बाद सामने आई और बारिश के दौरान इसमें तेजी आई। विशेषज्ञ इस पहलू की भी जांच करेंगे। सड़क निर्माण के दौरान ढलान की प्राकृतिक ज्यामिति में बदलाव, ढलान के निचले हिस्से का कटाव, जल निकासी में परिवर्तन या भार के पुनर्वितरण जैसी परिस्थितियां किसी पहले से कमजोर ढलान की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।

अब भूवैज्ञानिक टीम स्थल से जुटाए गए आंकड़ों का तकनीकी परीक्षण करेगी। इसमें मिट्टी की मोटाई, उसकी प्रकृति, जल निकासी, भूगर्भीय संरचना, ढलान की स्थिरता और वर्षा के बाद जमीन की प्रतिक्रिया जैसे पहलुओं का अध्ययन किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर जियोटेक्निकल जांच, ड्रेनेज अध्ययन, सर्वेक्षण और भू-गतिशीलता की निगरानी भी की जा सकती है।

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