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नेलांग घाटी में रंग लाई संरक्षण की मुहिम: दुर्लभ ‘सफेद हिमालयन लिली’ के 61% पौधे प्रतिकूल मौसम में भी जीवित

Dehradun, 07 November, 2026।  विलुप्ति की कगार पर खड़ी हिमालयी वनस्पतियों को नया जीवन देने के लिए उत्तराखंड वन विभाग द्वारा शुरू किया गया पहला दुर्लभ वनस्पति पुनर्स्थापना कार्यक्रम अब रंग लाने लगा है। मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) संजीव चतुर्वेदी के नेतृत्व और भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से वर्ष 2025 में शुरू की गई इस परियोजना के तहत नेलांग घाटी में रोपी गई ‘सफेद हिमालयन लिली’ (लिलियम पॉलीफाइलम) प्रतिकूल जलवायु को मात देकर पनप रही है।

2026 में किए गए पहले आकलन के अनुसार न सिर्फ लिली बल्कि कई अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों के पौधों ने भी 100 प्रतिशत तक जीवित रहने की दर दर्ज की है, जिससे हिमालयी जैव विविधता के संरक्षण को नई दिशा मिली है। मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) संजीव चतुर्वेदी के नेतृत्व में शुरू किए गए उत्तराखंड के पहले दुर्लभ वनस्पति पुनर्स्थापना कार्यक्रम के परिणाम अब सामने आने लगे हैं। वन विभाग ने वर्ष 2025 में इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य केवल दुर्लभ पौधों को नर्सरी में तैयार करना नहीं, बल्कि उन्हें उनके मूल प्राकृतिक आवास में दोबारा स्थापित कर जंगलों में उनकी आबादी बढ़ाना है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से शुरू इस परियोजना के पहले चरण में 11 संकटग्रस्त प्रजातियों के करीब 1400 पौधे अलग-अलग स्थानों पर रोपित किए गए थे। वर्ष 2026 में किए गए पहले आकलन में सात प्रजातियों के 42 से 100 प्रतिशत तक पौधे जीवित मिले हैं। मुख्य वन संरक्षक चतुर्वेदी ने बताया कि वन विभाग की अनुसंधान शाखा ने प्रजातियों के प्राकृतिक आवास, उनकी जैविक जरूरतों और अनुकूल परिस्थितियों को ध्यान में रखकर पुनर्स्थापना की रणनीति तैयार की। इसके तहत पौधों को उपयुक्त स्थानों पर रोपित करने के साथ उनके विकास और जीवित रहने की स्थिति का आकलन भी किया जा रहा है।

नेलांग घाटी में पाई जाने वाली सफेद हिमालयन लिली का वैज्ञानिक नाम लिलियम पॉलीफाइलम है। यह उत्तरकाशी के उच्च हिमालयी क्षेत्र की दुर्लभ वनस्पतियों में शामिल है। अत्यधिक ठंड, बर्फबारी, मिट्टी में नमी और तापमान में बदलाव इसके विकास को प्रभावित करते हैं। ऐसे वातावरण में पौधों को दोबारा स्थापित करना आसान नहीं है। यही वजह है कि 61 प्रतिशत पौधों का जीवित रहना इस परियोजना के लिए उत्साहजनक परिणाम माना जा रहा है।

परियोजना में अन्य दुर्लभ वनस्पतियों ने भी बेहतर परिणाम दिए हैं। कुछ प्रजातियों में पौधों की जीवित रहने की दर 100 प्रतिशत तक दर्ज की गई है। वहीं बीजों के अंकुरण में भी कुछ प्रजातियों में 97 प्रतिशत तक सफलता मिली है। इससे नर्सरी में दुर्लभ वनस्पतियों के बड़े पैमाने पर पौधे तैयार करने की संभावनाएं बढ़ी हैं।वन अनुसंधान शाखा अगले पांच वर्षों तक इन प्रजातियों की निगरानी करेगी। इसके आधार पर संरक्षण की तकनीक और पुनर्स्थापना की रणनीति में सुधार किया जाएगा। नेलांग घाटी में हिमालयन लिली का पनपना इस बात का संकेत है कि वैज्ञानिक तरीके से प्रयास किए जाएं तो विलुप्ति के खतरे से जूझ रही हिमालयी वनस्पतियों को उनके प्राकृतिक आवास में फिर से बसाया जा सकता है।

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