उत्तराखंड

सावधान! पगडंडियों पर ‘घात’ लगा रहा गुलदार, 61% हमले खेतों के रास्तों पर

देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष ने अब एक नया और डरावना मोड़ ले लिया है। अब तक माना जाता था कि जंगल के भीतर या रात के अंधेरे में गुलदार से खतरा अधिक होता है, लेकिन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के ताजा शोध ने इन दावों को पूरी तरह उलट दिया है। ‘वाइल्डलाइफ बुलेटिन’ में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, गुलदार के 61 प्रतिशत हमले खेतों को जाने वाली संकरी पगडंडियों पर हो रहे हैं, जबकि 30 प्रतिशत हमले घरों के ठीक आसपास दर्ज किए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि घने जंगलों में हमले का आंकड़ा महज सात प्रतिशत है, जो यह दर्शाता है कि गुलदार अब इंसानी बस्तियों के इर्द-गिर्द अपना नया ठिकाना बना चुका है। यह अध्ययन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से जुड़े शोधकर्ताओं की टीम ने किया है।
अध्ययन का नेतृत्व विश्वविद्यालय के पूर्व रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. दिनेश भट्ट ने किया। शोध में वर्ष 2011 से 2021 के बीच टिहरी जिले और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में हुए गुलदार हमलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के अनुसार इस अवधि में 29 लोगों की मौत गुलदार के हमलों में हुई, जबकि 77 लोग घायल हुए। शोधकर्ताओं ने स्थानीय ग्रामीणों की राय, घटनास्थलों के निरीक्षण और वन विभाग के रिकॉर्ड को भी अध्ययन में शामिल किया। शोध में यह भी पाया गया कि अधिकांश घटनाएं उन इलाकों में हुईं जहां खेतों तक पहुंचने के लिए संकरी और झाड़ियों से घिरी पगडंडियों का इस्तेमाल किया जाता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि गुलदार अब रात का इंतजार नहीं कर रहा, बल्कि दिन के समय भी गांवों के आसपास सक्रिय दिखाई दे रहा है। अधिकांश हमले दिन में दर्ज किए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में प्राकृतिक शिकार कम होने, तेजी से बढ़ती आबादी और मानव बस्तियों के जंगलों की ओर विस्तार के कारण गुलदार आबादी वाले इलाकों की तरफ बढ़ रहा है। खेतों और गांवों के बीच बनी संकरी पगडंडियां तथा झाड़ियों से घिरे रास्ते गुलदार के लिए छिपने की सुरक्षित जगह बन रहे हैं। इन रास्तों से रोजाना महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग खेतों, बाजार और स्कूल के लिए गुजरते हैं, जिससे खतरा और बढ़ गया है।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि गांवों और खेतों की पगडंडियों के आसपास उगी झाड़ियों को हटाने, रास्तों को चौड़ा करने और संवेदनशील क्षेत्रों में रोशनी की बेहतर व्यवस्था करने की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो पहाड़ में मानव-वन्यजीव संघर्ष आने वाले समय में और अधिक गंभीर रूप ले सकता है। शोध के अनुसार गांवों के आसपास तेजी से फैल रही “लेंटाना” झाड़ियां मानव-गुलदार संघर्ष की बड़ी वजह बन रही हैं।

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