उत्तराखंड

करौंदा, कैक्टस और बबूल से होगी अब गांव की सुरक्षा

देहरादून। उत्तराखंड में लगातार गहराते मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए वन विभाग ने एक बड़ा और पर्यावरण-अनुकूल कदम उठाया है। अब जंगलों की सीमाओं पर लोहे की तारबाड़ या कंक्रीट की दीवारों के बजाय कैक्टस, करौंदा, बबूल और रिंगाल जैसे कांटेदार स्थानीय पौधों की ‘बायोफेंसिंग’ (जैविक बाड़) तैयार की जाएगी। तराई से लेकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों तक की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई इस योजना का मकसद हाथियों, गुलदारों और जंगली सूअरों को आबादी वाले क्षेत्रों और खेतों में घुसने से रोकना है। विभाग ने राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार तराई से लेकर उच्च हिमालय तक अलग-अलग क्षेत्रों के लिए उपयुक्त पौधों का चयन कर लिया है। उत्तराखंड में बीते कुछ वर्षों में वन्यजीवों की आबादी वाले क्षेत्रों में आवाजाही बढ़ने से फसलों के नुकसान, पशुओं पर हमलों और कई स्थानों पर जनहानि की घटनाएं भी सामने आई हैं। ऐसे में वन विभाग अब केवल तारबाड़ या दीवारों पर निर्भर रहने के बजाय प्राकृतिक अवरोध तैयार करने पर जोर दे रहा है।

विभाग का मानना है कि स्थानीय प्रजातियों से तैयार बायोफेंसिंग पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ लंबे समय तक प्रभावी भी रहेगी। योजना के तहत 1000 मीटर तक के तराई-भाबर क्षेत्र में कैक्टस, लैमनग्रास और अन्य कांटेदार प्रजातियां लगाई जाएंगी। 1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में करौंदा, बेंत, बुरांस, रिंगाल और माल्टा की बायोफेंसिंग विकसित होगी। वहीं 2000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कांटेदार बबूल, स्थानीय झाड़ियां, हिंसालू, भृंगराज और सेब जैसी प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाएगी। वन विभाग ने उन क्षेत्रों के लिए भी विशेष योजना बनाई है, जहां बायोफेंसिंग संभव नहीं है। वहां मधुमक्खी बाड़ (बी-फेंसिंग) का प्रयोग किया जाएगा। वन सीमा पर मधुमक्खियों के बक्से लगाए जाएंगे, क्योंकि हाथी जैसे बड़े वन्यजीव मधुमक्खियों की गतिविधियों से दूरी बनाकर रखते हैं।

कार्बेट टाइगर रिजर्व में इस मॉडल से मिले सकारात्मक परिणामों के बाद अब इसे अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में भी लागू करने की तैयारी है। वन विभाग का मानना है कि प्राकृतिक बायोफेंसिंग, मधुमक्खी बाड़ और फसल विविधीकरण की यह संयुक्त रणनीति मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी। यदि यह मॉडल सफल रहा तो राज्य के सभी संवेदनशील वन क्षेत्रों में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा, जिससे ग्रामीणों की सुरक्षा के साथ वन्यजीव संरक्षण का संतुलन भी मजबूत होगा।

अपर प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) विवेक पांडेय ने बताया कि बायोफेंसिंग के लिए चयनित प्रजातियां स्थानीय पारिस्थितिकी, वन्यजीवों की गतिविधियों और ग्रामीणों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय की गई हैं। इससे वन्यजीवों की आवाजाही नियंत्रित होगी और खेतों को बेहतर सुरक्षा मिल सकेगी। साथ ही ग्रामीणों की भागीदारी से इस योजना को स्थायी रूप से सफल बनाया जाएगा।

इसके अलावा राजाजी टाइगर रिजर्व से सटे गांवों में किसानों को लैमनग्रास और मिंट जैसी सुगंधित फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इन फसलों की गंध कई वन्यजीवों को खेतों से दूर रखने में मददगार मानी जाती है। इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ फसलों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

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