पहाड़ों से पलायन रोकने और खेती बचाने की पहल को झटका, ‘स्वैच्छिक चकबंदी’ के लिए गांवों का चयन ही नहीं कर पाए अफसर

Dehradun, 04 October, 2026। पर्वतीय क्षेत्रों में बिखरी कृषि जोतों को एकीकृत कर पलायन रोकने और खेती को बढ़ावा देने के लिए लाई गई ‘स्वैच्छिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति’ शुरुआती चरण में ही अफसरों की सुस्ती का शिकार हो गई है। नीति अधिसूचित हुए चार महीने बीत जाने के बावजूद प्रदेश के 11 पर्वतीय जिलों के अधिकारी अब तक चकबंदी के लिए एक भी गांव का चयन नहीं कर पाए हैं। हर साल 55 गांवों में चकबंदी का लक्ष्य लेकर चल रहा शासन अब ढिलाई बरत रहे जिलाधिकारियों को रिमाइंडर भेजने की तैयारी कर रहा है। सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि भूमि के बिखराव को दूर करने के लिए स्वैच्छिक-आंशिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति अधिसूचित की थी। इसके तहत प्रत्येक जिले को हर साल पांच गांव चकबंदी के लिए चयनित करने हैं।
शासन ने संबंधित जिलाधिकारियों से भूमि विवाद से मुक्त पांच-पांच गांवों की सूची मांगी थी, ताकि ग्रामीणों की सहमति लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके। राजस्व विभाग ने अब जिलों को दोबारा निर्देश भेजने की तैयारी की है। राजस्व सचिव डा. एसएन पांडेय ने बताया कि जिलाधिकारियों को रिमाइंडर भेजकर गांवों के चयन में तेजी लाने के निर्देश दिए जा रहे हैं। उनका कहना है कि गांवों के चयन के बाद भूमिधरों की आपसी सहमति के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। नीति के तहत संबंधित क्षेत्र में न्यूनतम 10 हेक्टेयर भूमि होना आवश्यक है। यदि क्षेत्रफल इससे कम है तो कम से कम 25 खाताधारकों की लिखित सहमति जरूरी होगी। आवेदन बंदोबस्त अधिकारी (चकबंदी) अथवा सहायक कलेक्टर/परगनाधिकारी के समक्ष किया जा सकता है।
चकबंदी पूरी तरह भूमिधरों की आपसी सहमति पर आधारित होगी और प्राथमिकता भूमि विवाद से मुक्त गांवों को दी जाएगी। सरकार को उम्मीद है कि चकबंदी से कृषि और बागवानी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। अनुपयोगी और बंजर होती भूमि को फिर खेती से जोड़ने में मदद मिलेगी तथा ग्रामीणों की आजीविका के अवसर बढ़ेंगे। इससे पलायन रोकने के प्रयासों को भी गति मिल सकती है।लेकिन नीति के शुरुआती चरण में ही अधिकारियों की सुस्ती सामने आने से इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। 11 पर्वतीय जिलों में पांच वर्षों के भीतर कुल 275 गांवों को चकबंदी से जोड़ना है। इस हिसाब से हर साल 55 गांवों में प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए। लेकिन पहले चरण में ही गांवों की सूची शासन तक नहीं पहुंची है। इससे निर्धारित लक्ष्य की समयबद्ध प्राप्ति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। चकबंदी का उद्देश्य केवल खेतों की सीमाएं बदलना नहीं, बल्कि किसानों को उनकी बिखरी हुई भूमि के स्थान पर व्यवस्थित कृषि क्षेत्र उपलब्ध कराना है। पहाड़ में एक किसान के खेत कई स्थानों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में फैले हैं। ऐसे में जुताई, सिंचाई, बुवाई और फसल की देखरेख में अधिक श्रम और समय लगता है। यही वजह है कि चकबंदी को कृषि सुधार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है।रिमाइंडर से आगे कब बढ़ेगी कार्रवाई?



