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बॉर्डर टूरिज्म को पंख: उत्तराखंड के नीती, माणा समेत देश के 77 शौर्य स्थलों पर अब सैलानियों का डेरा

चीन सीमा से लौटकर- किरण शर्मा, देहरादून। समुद्र तल से 13 हजार फीट की ऊंचाई पर बसे बर्फीले वीराने और धूसर पहाड़ों के बीच अब देश की सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ पर्यटन की नई इबारत लिखी जा रही है। उत्तराखंड के चमोली जिले की नीती घाटी और पिथौरागढ़ के सीमांत गांव अब सैलानियों के स्वागत के लिए तैयार हो रहे हैं। सरकार की ‘रणभूमि दर्शन’ और ‘वाइब्रेंट विलेज’ जैसी योजनाओं से जहां एक ओर इन दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों और पुलों का जाल बिछ रहा है, वहीं इनर लाइन परमिट की सरलता और होम-स्टे के बढ़ते चलन ने स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार की नई राहें खोल दी हैं। यह है भारत-चीन सीमा से सटी चमोली जिले की नीती घाटी, जो अब देश में विकसित हो रहे बार्डर टूरिज्म का प्रमुख केंद्र बनने जा रही है।

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘रणभूमि दर्शन’ योजना के तहत उत्तराखंड सहित देश के आठ राज्यों में 77 शौर्य स्थलों का चयन किया गया है। इस पहल का उद्देश्य केवल सीमावर्ती क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देना ही नहीं, बल्कि देशवासियों को भारतीय सेना के साहस, बलिदान और सीमाओं की कठिन परिस्थितियों से भी परिचित कराना है। योजना के तहत पर्यटकों को उन दुर्गम सीमांत क्षेत्रों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा, जहां आमतौर पर आम नागरिकों की पहुंच सीमित रही है।

उत्तराखंड में नीती घाटी, माणा, मलारी, हर्षिल, धारचूला, गुंजी और लिपुलेख जैसे रणनीतिक महत्व के क्षेत्रों को इस पहल से नई पहचान मिलने जा रही है। वहीं, लद्दाख की गलवान घाटी समेत अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों को भी पर्यटन मानचित्र पर लाने की तैयारी है।इस योजना में भारतीय सेना भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार इससे न केवल लोगों को सीमाओं की परिस्थितियों को समझने का अवसर मिलेगा, बल्कि राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की भावना भी मजबूत होगी। नीती गांव के होम-स्टे संचालक प्रेम सिंह फोनिया बताते हैं कि बॉर्डर टूरिज्म ने सीमांत गांवों की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है।

पर्यटकों में इन क्षेत्रों को करीब से देखने और सीमा पर तैनात जवानों के जीवन को समझने को लेकर खासा उत्साह है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिल रहे हैं। होम-स्टे, स्थानीय गाइड, परिवहन और हस्तशिल्प से जुड़े व्यवसायों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। रक्षा मंत्रालय ने सीमावर्ती क्षेत्रों में आने-जाने के लिए आवश्यक इनर लाइन परमिट (आईएलपी) प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक सरल और सुगम बनाया जा रहा है।

भारत-चीन सीमा से सटे पिथौरागढ़ जिले के छह सीमांत गांवों को बेहतर सड़क संपर्क से जोड़ने की तैयारी तेज हो गई है। वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के तहत इन गांवों के लिए स्वीकृत सड़कों पर पुलों के निर्माण का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है। उत्तराखंड ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण (यूआरआरडीए) ने करीब 87.38 करोड़ रुपये की डीपीआर तैयार की है। पुल बनने से सीमावर्ती क्षेत्रों में आवागमन सुगम होगा और स्थानीय लोगों के साथ-साथ सुरक्षा बलों को भी लाभ मिलेगा।

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