राजाजी के जंगलों में ‘AI की तीसरी आँख’, हाथियों के लिए देवदूत बनी नई तकनीक

देहरादून। उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क क्षेत्र से गुजरने वाला कांसरों-हरिद्वार रेलवे ट्रैक वर्षों से वन्यजीवों के लिए एक संवेदनशील क्षेत्र रहा है, जहां 2010 से अब तक ट्रेन की चपेट में आने से आठ हाथियों की जान जा चुकी है। इस गंभीर समस्या के समाधान और मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए रेलवे ने एक ऐतिहासिक पहल की है। प्रदेश में पहली बार 22 किलोमीटर लंबे इस ट्रैक पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित इंट्रूजन डिटेक्शन सिस्टम (IDS) स्थापित किया गया है। असम के बाद इस अत्याधुनिक तकनीक को अपनाने वाला उत्तराखंड देश का प्रमुख राज्य बनने जा रहा है, जिससे न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि ट्रेनों का सुरक्षित संचालन भी संभव हो सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक केवल हाथियों की जान बचाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ट्रेनों के सुरक्षित संचालन, मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी और जैव विविधता संरक्षण की दिशा में भी बड़ा बदलाव लाएगी।
यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो उत्तराखंड देश में रेलवे और वन्यजीव संरक्षण के बीच तकनीक आधारित संतुलन का नया उदाहरण बन सकता है। रेलवे ट्रैक के समानांतर लगभग एक मीटर गहराई में ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाई गई है। इसके साथ एआई आधारित विशेष सेंसर लगाए गए हैं। जब कोई हाथी या अन्य बड़ा वन्यजीव ट्रैक के दोनों ओर लगभग 100 मीटर के दायरे में चलता है, तो उसके कदमों से जमीन में पैदा होने वाली कंपन (वाइब्रेशन) को सेंसर तुरंत पहचान लेते हैं। एआई इन संकेतों का विश्लेषण कर कुछ ही सेकंड में लोको पायलट के टैबलेट पर अलर्ट भेज देता है। खासियत यह है कि ओएफसी बिछाते वक्त वृक्षों को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. कोको रोसे ने बताया कि इस तकनीक का पिछले वर्ष मोतीचूर क्षेत्र में सफल ट्रायल किया जा चुका है। अब इसका प्रस्ताव राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक में रखा जाएगा। परिणाम पूरी तरह सफल रहने पर इसे उत्तराखंड के अन्य संवेदनशील रेलवे ट्रैक पर भी लागू करने की योजना है। वाइल्ड लाइफ बोर्ड के नियमों के अनुसार देहरादून से हरिद्वार के बीच इस ट्रैक पर ट्रेनों की गति सीमा निर्धारित है। नियमानुसार दिन में ट्रेन की गति 40 किमी प्रतिघंटा तो रात में यह 35 किमी है।



