उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष बना आजीविका पर संकट, 14 सालों में 63 हजार से ज्यादा मवेशी शिकार

देहरादून। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब केवल जनसुरक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी एक गंभीर चुनौती बन चुका है। वन विभाग के नवीनतम अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2011 से 2025 के बीच प्रदेश में गुलदार, बाघ और अन्य वन्यजीवों ने 63,478 मवेशियों को अपना शिकार बनाया, जबकि फसल क्षति की 18,994 घटनाएं दर्ज की गईं। हर साल औसतन 4,500 से अधिक मवेशियों और 1,300 से अधिक फसल नुकसान के मामलों ने पहाड़ी और तराई क्षेत्रों के किसानों व पशुपालकों की आजीविका को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। 71.05 प्रतिशत वन क्षेत्र वाले उत्तराखंड में बड़ी आबादी खेती और पशुपालन पर निर्भर है।
पहाड़ी और तराई दोनों क्षेत्रों में गुलदार और बाघ लगातार गाय, भैंस, बैल, भेड़ और बकरियों को निशाना बना रहे हैं। पशुधन ग्रामीणों की आय का प्रमुख साधन है, इसलिए हर हमले के साथ परिवारों को आर्थिक झटका भी झेलना पड़ता है। कई क्षेत्रों में लोग अब पशुपालन का दायरा बढ़ाने से भी हिचकने लगे हैं। पशुधन के साथ-साथ खेती भी वन्यजीवों के बढ़ते दबाव से प्रभावित हो रही है।
अध्ययन के मुताबिक अप्रैल 2011 से मार्च 2025 तक फसल क्षति की 18,994 घटनाएं दर्ज की गईं। जंगली सूअर, बंदर, लंगूर, हाथी और अन्य वन्यजीव खेतों में घुसकर धान, मक्का, गेहूं, सब्जियों और अन्य फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे किसानों की मेहनत पर पानी फिर रहा है और खेती की लागत निकालना भी मुश्किल होता जा रहा है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में किसान खेती से विमुख होने लगे हैं, जिससे कृषि उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका बढ़ रही है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि संघर्ष को कम करने के लिए वन सीमाओं पर मजबूत बाड़, सौर ऊर्जा आधारित सुरक्षा प्रणाली, आधुनिक निगरानी तकनीक, त्वरित मुआवजा भुगतान और स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है।
अपर प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) विवेक पांडेय के अनुसार राज्य सरकार मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम कर रही है। आधुनिक तकनीक और प्रभावी प्रबंधन के जरिए पशुधन, फसलों और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं।
वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011-12 में पशुधन हानि के 2319 मामले दर्ज किए गए थे। इसके बाद हर साल इन घटनाओं में बढ़ोतरी होती गई। वर्ष 2020-21 के बाद स्थिति और अधिक गंभीर हो गई, जब प्रतिवर्ष पांच हजार से साढ़े छह हजार तक मवेशी वन्यजीवों के हमलों का शिकार बनने लगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ती प्रवृत्ति वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों पर बढ़ते दबाव और जंगलों के आसपास मानव गतिविधियों के विस्तार का परिणाम है।



