उत्तराखंड

पहाड़ में रहकर भी वैज्ञानिक सोच और मेहनत से लिखा जा सकता है उज्ज्वल भविष्य

पौड़ी गढ़वाल। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन के बीच पौड़ी गढ़वाल जिले के थलीसैंण विकासखंड से एक उम्मीद जगाने वाली खबर सामने आई है। राजकीय इंटर कॉलेज बैंजरो में रसायन विज्ञान के प्रवक्ता दीनदयाल बिष्ट ने यह साबित कर दिया है कि यदि मजबूत इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सरकारी योजनाओं का सही तालमेल हो, तो पहाड़ की माटी भी सोना उगल सकती है। कोविड-19 के दौर में अपने गांव सुकई (बंज्वाड़) की खाली पड़ी जमीन पर आधुनिक सेब और कीवी की बागवानी शुरू करने वाले दीनदयाल आज हर साल 3 से 4 लाख रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। मनरेगा, कृषि और उद्यान विभाग के सहयोग से खड़ी हुई उनकी यह सफलता न केवल मुख्यमंत्री के ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ के संकल्प को गति दे रही है, बल्कि रोजगार की तलाश में पहाड़ छोड़ने का विचार कर रहे युवाओं के लिए भी एक नई राह दिखा रही है। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान जब अधिकांश लोग भविष्य को लेकर असमंजस में थे, तब दीनदयाल बिष्ट ने अपने गांव की खाली पड़ी जमीन को नई पहचान देने का संकल्प लिया। उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से सेब और कीवी के पौधे लगाए।

शुरुआत में चुनौतियां जरूर आईं, लेकिन धैर्य, नियमित देखभाल और आधुनिक तकनीकों के प्रयोग से उनका बगीचा धीरे-धीरे व्यावसायिक रूप लेने लगा। आज उनके बाग में तैयार हो रहे उच्च गुणवत्ता वाले फल न केवल अच्छी आमदनी का स्रोत हैं, बल्कि आसपास के किसानों और युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र भी बन चुके हैं। दीनदयाल बिष्ट की सफलता यह संदेश देती है कि आत्मनिर्भरता का रास्ता अपने गांव और अपनी जमीन से भी निकल सकता है। उनकी उपलब्धि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की किसान हितैषी योजनाओं और आत्मनिर्भर उत्तराखंड के संकल्प को भी मजबूती देती है।

यह कहानी केवल एक शिक्षक की सफलता नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो रोजगार की तलाश में पहाड़ छोड़ने का विचार करते हैं। दीनदयाल बिष्ट ने अपने कार्य से यह साबित कर दिया है कि मेहनत, वैज्ञानिक सोच और सरकारी सहयोग के बल पर पहाड़ में भी उज्ज्वल भविष्य बनाया जा सकता है। जिला उद्यान अधिकारी मनोरंजन भंडारी ने बताया कि जनपद में सेब, कीवी सहित उच्च मूल्य वाली फल बागवानी को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी परामर्श और विभागीय योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु इन फसलों के लिए अत्यंत अनुकूल है और यदि किसान वैज्ञानिक तरीके अपनाएं तो सीमित भूमि से भी बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। दीनदयाल ने मनरेगा के तहत बाग की घेरबाड़ कराई गई। कृषि विभाग ने जियोटैंक और पाइपलाइन के माध्यम से सिंचाई की व्यवस्था विकसित करने में सहयोग दिया। जबकि उद्यान विभाग ने पौधों के चयन, रोपण, देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन तक हर स्तर पर तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया। इन प्रयासों से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय सुधार हुआ, जिससे उनकी आय लगातार बढ़ती गई।

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