उत्तराखंड

अतिवृष्टि-भूस्खलन के दौरान तुरंत बहाल होगी जलापूर्ति

देहरादून। विगत वर्ष 2025 की प्राकृतिक आपदाओं से बड़ा सबक लेते हुए उत्तराखंड पेयजल विभाग ने आगामी मानसून से पहले राज्यभर में व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। विभाग ने सभी जिलों को संवेदनशील पेयजल योजनाओं और जलस्रोतों का ‘वल्नरेबिलिटी असेसमेंट’ (जोखिम मूल्यांकन) करने के कड़े निर्देश दिए हैं। इस बार विभाग की रणनीति है कि भूस्खलन, अतिवृष्टि या बादल फटने जैसी आपात स्थितियों के दौरान यदि मुख्य लाइनें क्षतिग्रस्त होती हैं, तो बिना समय गंवाए तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था से जनता तक पानी पहुंचाया जा सके। इसके लिए विस्तृत आपदा प्रबंधन कार्ययोजना के तहत राज्य से लेकर जिला स्तर तक कंट्रोल रूम और त्वरित प्रतिक्रिया टीमों (QRT) को एक्टिव किया जा रहा है। विभाग का मानना है कि जोखिम वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान होने पर नुकसान कम होगा और लोगों को पेयजल संकट से बचाया जा सकेगा।

दरअसल, वर्ष 2025 में प्राकृतिक आपदाओं के कारण राज्यभर में 3,374 पेयजल योजनाएं और संरचनाएं क्षतिग्रस्त हुई थीं। इनकी मरम्मत और पुनर्स्थापना के लिए करीब 120.78 करोड़ रुपये की आवश्यकता आंकी गई। इसी अनुभव को देखते हुए विभाग ने विस्तृत आपदा प्रबंधन कार्ययोजना लागू करने का निर्णय लिया है। इसके तहत राज्य और जिला स्तर पर कंट्रोल रूम सक्रिय रहेंगे तथा अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता और जूनियर अभियंताओं की त्वरित प्रतिक्रिया टीमें गठित की जाएंगी। सभी जिलों में ऐसी पेयजल योजनाओं को चिह्नित किया जाएगा, जहां मानसून के दौरान सबसे अधिक खतरा रहता है। विभाग ने निर्देश दिए हैं कि जिन योजनाओं के क्षतिग्रस्त होने की आशंका है, उनके लिए पहले से वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखी जाए। जरूरत पड़ने पर टैंकरों, अस्थायी पाइपलाइन और वैकल्पिक जलस्रोतों के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही सोडियम हाइपोक्लोराइट, ब्लीचिंग पाउडर, पाइप, वाल्व, मोटर, फिटिंग, जनरेटर और अन्य आवश्यक उपकरणों का पर्याप्त भंडारण जिलों में सुनिश्चित किया जाएगा, ताकि आपदा के तुरंत बाद मरम्मत कार्य शुरू किया जा सके। विभाग का लक्ष्य है कि मानसून के दौरान किसी भी आपदा की स्थिति में प्रभावित क्षेत्रों में न्यूनतम समय में पेयजल आपूर्ति बहाल की जाए और लोगों को लंबे समय तक पेयजल संकट का सामना न करना पड़े।

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