उत्तराखंड

भूकंप: उत्तराखंड के नीचे जमीन में लगातार बढ़ रहा बड़ा तनाव, एमएचटी फॉल्ट के ‘लॉक’ होने से बड़े खतरा

Dehradun, 12 October, 2026।  उत्तराखंड के नीचे हिमालय क्षेत्र में एक बड़ा भूगर्भीय खतरा धीरे-धीरे पनप रहा है। लगभग नौ साल चले एक नए वैज्ञानिक अध्ययन से खुलासा हुआ है कि राज्य के नीचे मौजूद ‘मेन हिमालयन थ्रस्ट’ (MHT) का करीब 115 किलोमीटर चौड़ा और 20 किलोमीटर गहरा हिस्सा पूरी तरह ‘लॉक’ (बंद) है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तमिलनाडु के वैज्ञानिकों द्वारा जीएनएसएस और इन्सार डेटा के आधार पर किए गए इस शोध के मुताबिक, भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की गति के कारण ऊर्जा सामान्य तरीके से बाहर निकलने के बजाय धरती के भीतर तनाव के रूप में लगातार जमा हो रही है, जो भविष्य के भूकंपीय जोखिमों के लिहाज से एक गंभीर संकेत है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तमिलनाडु में भूविज्ञान की सहायक प्रोफेसर डिब्याशक्ति पांडा ने वैज्ञानिकों के दल के साथ करीब नौ साल के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है।

वैज्ञानिकों ने ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) और इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (इन्सार) के आंकड़ों का इस्तेमाल किया। जीएनएसएस से पता चला कि इस क्षेत्र में करीब 18 मिलीमीटर प्रति वर्ष का स्लिप डिफिसिट है। इसका मतलब है कि भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की आपसी गति के मुकाबले फॉल्ट उतना नहीं खिसक रहा है। दोनों प्लेटों की गति से पैदा होने वाला अंतर धरती के अंदर तनाव के रूप में जमा हो रहा है। इन्सार से 2015 से 2024 के बीच जमीन की ऊर्ध्वाधर हलचल का भी अध्ययन किया गया। इसमें अधिकतम 4 से 6 मिलीमीटर प्रति वर्ष तक जमीन के उठने के संकेत मिले। वैज्ञानिकों के अनुसार जीएनएसएस और इन्सार से मिले आंकड़े फॉल्ट के लॉक होने की तस्वीर को मजबूत करते हैं।

प्रोफेसर पांडा के अनुसार करीब 300 किलोमीटर लंबे अध्ययन क्षेत्र में जमा हो रही तनाव ऊर्जा को हर 100 साल में एमडब्ल्यू 8.1 के भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा के बराबर है। एमडब्ल्यू यानी मोमेंट मैग्नीट्यूड भूकंप की ऊर्जा और ताकत को मापने का वैज्ञानिक पैमाना है। संख्या जितनी अधिक होती है, भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा उतनी ज्यादा होती है। मेन हिमालयन थ्रस्ट हिमालय के नीचे गहराई में मौजूद बड़ी भूगर्भीय प्लेट सीमा है। गढ़वाल और कुमाऊं हिमालय में इसके व्यवहार और संरचना का अध्ययन किया गया है। व्यापक हिमालयी क्षेत्र में उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और पौड़ी से लेकर बागेश्वर, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ की ओर का पर्वतीय क्षेत्र इस भूगर्भीय व्यवस्था से जुड़ा है। हालांकि फॉल्ट की सतही रेखा को इन सभी जिलों से सीधे गुजरने वाला बताना सही नहीं होगा, क्योंकि एमएचटी जमीन के भीतर कई किलोमीटर की गहराई में है।

नए अध्ययन की एक अहम बात यह है कि उत्तराखंड के नीचे एमएचटी के एक हिस्से को पहले अपेक्षाकृत कमजोर या लो-कपलिंग जोन माना गया था। नए विश्लेषण में ऐसा कोई महत्वपूर्ण कमजोर हिस्सा नहीं मिला। अध्ययन में प्लेट कपलिंग 0.8 से अधिक पाई गई। यानी प्लेटों की 80 प्रतिशत से अधिक गति फॉल्ट पर प्रभावी रूप से लॉक है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे पूरे अध्ययन क्षेत्र में मजबूत कपलिंग का संकेत मिलता है। उत्तराखंड हिमालय भूकंपीय गतिविधियों के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र है। इसलिए फॉल्ट के नीचे जमा हो रहे तनाव की लगातार निगरानी महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार जीएनएसएस, इन्सार और अन्य भू-वैज्ञानिक निगरानी प्रणालियों से जमीन में होने वाले छोटे बदलावों को लगातार दर्ज करने से भविष्य के भूकंपीय जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है। यह अध्ययन किसी तत्काल बड़े भूकंप की घोषणा नहीं करता, लेकिन उत्तराखंड के नीचे सक्रिय भूगर्भीय प्रक्रिया को समझने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी देता है।

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