उत्तराखंड

124 साल पुरानी पौड़ी जिला जेल अब बनेगी विरासत संग्रहालय

पौड़ी। ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1902 में स्थापित गढ़वाल मंडल की पहली ऐतिहासिक जिला जेल अब एक भव्य विरासत संग्रहालय के रूप में विकसित होने जा रही है। स्वतंत्रता संग्राम, कुली बेगार और पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन जैसे महान संघर्षों की साक्षी रही इस जेल को संरक्षित करने के लिए जिला योजना से ₹1.77 करोड़ की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की गई है, जिसकी ₹37.89 लाख की पहली किस्त भी जारी हो चुकी है। संबंधित विभाग ने इस पूरी परियोजना को एक वर्ष के भीतर पूरा करने का लक्ष्य तय किया है, जिसके बाद नई पीढ़ी को उत्तराखंड के गौरवशाली इतिहास और आजादी के मतवालों के संघर्ष को करीब से देखने का मौका मिलेगा।

जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया ने इस परियोजना को इतिहास की एक जीवंत धरोहर करार देते हुए बताया कि करीब 910 वर्गमीटर में फैले इस परिसर को हुबहू पुराने ब्रिटिशकालीन वातावरण में ढाला जाएगा। मुख्य द्वार पर सुरक्षा कर्मियों की प्रतिमाओं से लेकर तत्कालीन जेलर कक्ष, सामूहिक बैरक और कालकोठरियों को सहेजा जाएगा, जहां वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, कप्तान रामप्रसाद नौटियाल और बैरिस्टर मुकुंदी लाल जैसे महानायकों की यादें जीवंत होंगी। वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ द्वारा की गई इस घोषणा के धरातल पर उतरने से यह ऐतिहासिक परिसर अब प्रदेश के नक्शे पर एक प्रमुख सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के रूप में चमकेगा।

संग्रहालय में प्रवेश करते ही आगंतुकों को ब्रिटिशकालीन जेल का वातावरण महसूस होगा। मुख्य प्रवेश द्वार पर उस समय के सुरक्षा कर्मियों की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। जेलर कक्ष को पुराने स्वरूप में विकसित कर वहां तत्कालीन जेलर का दृश्य प्रस्तुत किया जाएगा। इसके साथ ही उस दौर के प्रमुख अधिवक्ताओं की प्रतिमाएं भी लगाई जाएंगी। बैरक, कैदखाने और कालकोठरियों को संरक्षित कर वहां कैदियों के दैनिक जीवन, श्रम व्यवस्था और जेल संचालन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी प्रदर्शित की जाएंगी। करीब 910 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले इस परिसर में एक जेलर कक्ष, एक सामूहिक बैरक, दो कैदखाने और दो कालकोठरियां मौजूद हैं।

यह जेल केवल अपराधियों को रखने का स्थान नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम, कुली बेगार आंदोलन, गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन, आपातकाल और पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन जैसे कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संघर्षों की साक्षी भी रही है। इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1921 के असहयोग आंदोलन से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक करीब 396 राजनीतिक बंदियों को यहां तीन दिन से लेकर दो माह तक रखा गया। जेल की क्षमता केवल आठ कैदियों की थी। इसलिए अधिक अवधि की सजा पाने वाले बंदियों को बाद में बिजनौर, बरेली और लखनऊ की जेलों में भेज दिया जाता था। इस ऐतिहासिक जेल में पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, गोविंद बल्लभ पंत, कप्तान रामप्रसाद नौटियाल, बलदेव सिंह आर्य, भक्त दर्शन, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, मंगतराम खंतवाल, बड़ोला बंधु, कोतवाल सिंह नेगी, भोला दत्त चंदोला, जीवनंद खंडूड़ी और महेशानंद थपलियाल सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानी और जननेता बंदी रहे।

उनकी पैरवी बैरिस्टर मुकुंदी लाल और गोविंद बल्लभ पंत जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने की थी। संग्रहालय के रूप में विकसित होने के बाद यह ऐतिहासिक परिसर न केवल गढ़वाल के गौरवशाली अतीत को सहेजेगा, बल्कि नई पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन और उत्तराखंड के जनसंघर्षों से भी परिचित कराएगा। साथ ही, इसके प्रदेश के प्रमुख ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन स्थलों में शामिल होने की भी उम्मीद है। वर्ष 2008 में खांड्यूसैंण में नई जिला जेल बनने के बाद पौड़ी जेल को वहां स्थानांतरित कर दिया गया था। इसके बाद वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने इस ऐतिहासिक भवन को संग्रहालय में बदलने की घोषणा की थी।जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया ने कहा कि पौड़ी की ऐतिहासिक जेल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और जनआंदोलनों की जीवंत धरोहर है।

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