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निर्दलीय प्रत्याशी को दूर-दूर भी नजर नहीं आई काली भेड़ तो फिर क्या होगा !

सतीश नांदल निर्दलीय।

धर्मपाल वर्मा 

दक्ष दर्पण समाचार सेवा चण्डीगढ़।

dakshdarpan2024@gmail.com

राजनीति में हरियाणा कई बार विशेष तौर पर चर्चा में रहता है। दल बदल, क्रॉस वोटिंग, तरह-तरह की हेरा फेरी हरियाणा की राजनीति पर ऐसे बदनुमा दाग है जिनकी लोग चटकारे ले लें लेकर चर्चा करते हैं।

राज्य में राज्यसभा के चुनाव में कई बार ऊपर का माल नीचे और नीचे का माल ऊपर होता रहा है। कभी सत्ता पक्ष के दबाव में विधायकों को अयोग्य घोषित करने का तरीका अप्लाई किया गया। कई बार क्रॉस वोटिंग हुई। कुछ विधायकों ने सोची समझी योजना के तहत अपनी पर्ची दिखाकर जानबूझकर वोट कैंसिल कराया। कई बार दूसरे तरीके अपनाए गए। पोलिंग के दौरान स्याही बदलकर कैंडिडेट्स की किस्मत बदलने के प्रयास हुए ,भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके समर्थक विधायकों की भूमिका पर सवाल उठे ।

आपको याद होगा कि हरियाणा में कांग्रेस हाई कमान ने जब अजय माकन को राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में अधिकृत किया तो कांग्रेस के दो विधायकों द्वारा कथित तौर पर क्रॉस वोटिंग के कारण वह चुनाव हार गए। देखा जाए तो उस प्रकरण में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कोई गलती नहीं थी। क्योंकि कथित तौर पर जिन्होंने क्रॉस वोटिंग की वही दोनों विधायक कांग्रेस छोड़ने और भाजपा में शामिल होने का मन पहले ही बना चुके थे । यह दोनों बेशक भाजपा में है परंतु सब देख रहे हैं कि आजकल अच्छे दौर से नहीं गुजर रहे हैं।

अब सवाल यह है कि निर्दलीय के नाम से जिस तीसरे उम्मीदवार ने नामांकन पत्र दाखिल किया है वह कहने को ही निर्दलीय है उसके प्रस्तावक और समर्थन करने वाले सभी विधायक या तो भाजपा के हैं या निर्दलीय है। बेशक वह भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार कहे जा रहे हैं लेकिन उतने ठोस उम्मीदवार नहीं माने जा रहे हैं जैसे सुभाष चंद्रा और कार्तिकेय शर्मा थे।

लोग इस तीसरे उम्मीदवार की एंट्री पर यह सवाल भी उठा रहे हैं कि भाजपा ने या उसके नेताओं ने यह संदेश दे दिया है कि पंजाबी उनकी प्राथमिकता हैं, जाट नहीं। क्योंकि जाट प्राथमिकता होते तो संजय भाटिया की जगह किसी नांदल जैसे नेता का नाम आ गया होता। देखा जाए तो अब जाट यह महसूस कर रहे होंगे कि नांदल की उम्मीदवारी से उनकी स्थिति और भी हास्यास्पद हो गई है क्योंकि नांदल केवल मांगने की मुद्रा में रहेंगे और मिलेगा भी कुछ नहीं।

जो खुद को निर्दलीय उम्मीदवार भी बता रहा है और भाजपा का प्रदेश उपाध्यक्ष भी उसे अब इंडियन नेशनल लोक दल की दो वोटों की भी पास नहीं करनी चाहिए।

बहुत लोग तो इस बात की इंतजार भी कर रहे हैं कि यह निर्दलीय उम्मीदवार नामांकन पत्र वापस लेने की तारीख 9 मार्च के बाद भी टिका रहेगा या नहीं। एक बात साफ नजर आ रही है कि इस चुनाव में जिन लोगों की रुचि काली भेड़ों का पता लगाने में है उन्हें भी शायद निराशा ही हाथ लगेगी। क्योंकि 12 बीघे में दाना नहीं है।

जो लोग कांग्रेस के विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग किए जाने की आस लगाए बैठे हैं या ऐसे दावे कर रहे हैं उन्हें भी निराश ही होना पड़ेगा। जानकार तो इस बात का दावा भी कर रहे हैं कि मतदान के समय कांग्रेस के मतों। की संख्या 37 से 38 हो सकती है 36 नहीं । क्योंकि भूपेंद्र सिंह हुड्डा को इस चुनाव में भी परीक्षा देनी होगी। यदि कोई चूक हो भी गई तो इसका खामियाजा कई तरह से भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भुगतना पड़ सकता है। बेशक उनकी मर्जी का उम्मीदवार नहीं आया है फिर भी उन्हें कई तरह की सावधानियां बरतनी पड़ रही है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा है कि कांग्रेस के सभी 37 वोट पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में पड़ेंगे।

परिस्थितियां ऐसी है कि भाजपा और कांग्रेस अपने अधिकृत उम्मीदवारों को जिताकर ले जाने में सफल हो जाएंगे, निर्दलीय की जीत की संभावनाएं बहुत क्षीण हैं। वह केवल एक्सपोज होंगे।

इस चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल के दो विधायकों की भूमिका स्पष्ट नहीं हो पाई है लेकिन इनके भाजपा के अतिरिक्त निर्दलीय के पक्ष में मतदान करने के आसार भी नहीं नजर आ रहे। उस हालत में तो कतई भी नहीं जब निर्दलीय प्रत्याशी सतीश नांदल खुद को निर्दलीय से पहले भाजपा का प्रदेश उपाध्यक्ष बता रहे हों। इस तरह से इंडियन नेशनल लोकदल गर्म और ठंडी गोली एक साथ गटकने की गलती बिल्कुल नहीं करेगा।

भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष सतीश नांदल की तुलना कार्तिकेय शर्मा और सुभाष चंद्रा से नहीं की जा सकती क्योंकि जहां यह दोनों अपने-अपने पहले चुनाव जीत गए ।वही सतीश नांदल चुनाव की जीत को तरसते आ रहे हैं ।

वह जाट संस्थाओं कै चुनाव में नहीं जीत पाए ,विधानसभा का चुनाव भी हार गए। उनका बेटा रोहतक नगर निगम के मेयर के चुनाव में हार गया। यह अलग बात है कि उनकी उम्मीदवारी भाजपा के काम आई ।

कुल मिलाकर सतीश नांदल की सफलता की संभावनाएं बहुत कम है।

कांग्रेस के उम्मीदवार कर्मवीर सिंह बौद्ध जीत गए तो भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कांग्रेस में ही नहीं प्रदेश में भी विश्वसनीयता बढ़ेगी और वह विरोधियों को कड़ा जवाब देने की स्थिति में भी आ जाएंगे।

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